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India Arab foreign ministers meeting: भारत अरब कूटनीति का केंद्र बिंदु बन गया है. आखिर क्यों, अरब देशों के बड़े-बड़े खलीफा दिल्ली में डेरा जमाकर बैठ रहे हैं? इस विश्लेषण को समझने के लिए आपको अब से थोड़ी देर बाद शुरु होने वाली कूटनीतिक मैराथन से जुड़ा अपडेट बेहद गौर से पढ़ना चाहिए. इसकी पिछली मीटिंग 2016 में हुई थी. 10 साल बाद अचानक उस फोरम को एक्टिवेट किया गया है. इसके पीछे एक ही वजह है. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की वजह से इस्लामिक जगत में बढ़ती टेंशन. यही कारण है कि आज दिल्ली में भारत और अरब जगत के विदेश मंत्री मिलेंगे तो तीन किरदारों की नजर इस मीटिंग के हर पल पर बनी रहेगी.

ये किरदार हैं डोनाल्ड ट्रंप, अयातुल्ला खामेनेई और पाकिस्तान का फील्ड मार्शल आसिम मुनीर. आखिर ट्रंप, खामेनेई और मुनीर को इस मीटिंग में क्या दिलचस्पी होगी. अब हम आपको एक-एक करके इसी मुद्दे से जुड़ी बेहद अहम जानकारी देने जा रहे हैं. सबसे पहले ट्रंप की बात करते हैं. दिल्ली में होने वाली इस मीटिंग को लेकर दो कारणों से ट्रंप के अंदर फिक्र पैदा होगी. पहला फैक्टर है गाजा को लेकर वो बोर्ड ऑफ पीस जिसे ट्रंप ने खड़ा किया है. ट्रंप ने इस बोर्ड के जरिए अधिकतर अरब देशों को अपने पीछे लामबंद करने की कोशिश की थी.

अगर भारत के साथ अरब देशों ने एक परचम के तले आकर सहयोग पर सहमति जताई तो ये संभावित गठबंधन ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस के लिए यकीनन चुनौती बन जाएगा. ट्रंप ने रूस से तेल के आयात को लेकर भारत पर टैरिफ लगाया था. दिल्ली में होने वाली मीटिंग का एक बड़ा एजेंडा ऊर्जा भी है. अगर अरब देशों ने भारत को किसी रियायत या वाजिब फॉर्मूले के साथ तेल सप्लाई करने पर हामी भरी तो ट्रंप के टैरिफ वाले हथियार की धार कुंद पड़ जाएगी.

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इस मीटिंग में ट्रंप की दिलचस्पी की सबसे बड़ी वजह है ईरान को लेकर मीटिंग में होने वाली चर्चा, जैसा कि हमने आपको बताया था कि इस मीटिंग में IAFMM के कोर एजेंडा के साथ ही साथ मिडिल ईस्ट की जियो पॉलिटिकल टेंशन पर भी बात होगी. 23 जनवरी को ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उस प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया था जो ईरान को लेकर अमेरिका लाया था. ट्रंप को ये फिक्र जरूर सता रही होगी कही भारत के साथ बैठकर ईरान के मुद्दे पर अरब देश कोई ऐसी सहमति ना बना ले जो अमेरिका को कबूल नहीं हो. ट्रंप की टेंशन डीकोड करने के बाद अब नंबर, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई का. खामेनेई की सरकार और पूरा सिस्टम इस DIPLOMACY IN DELHI पर पूरी नजर रखेगा.

खामेनेई के सामने इस वक्त दो बड़े प्रतिद्वंदी मौजूद हैं. पहला है अमेरिका और दूसरा है वो इजरायल जिससे पिछले ही साल ईरान ने 13 दिनों तक जंग लड़ी है. ये दुनिया को पता है कि इजरायल और भारत के रिश्ते काफी पुराने और मजबूत हैं. अगर दिल्ली के मंच से अरब देशों ने इन संबंधों के आधार पर इजरायल से रिश्ते आगे बढ़ाने पर विचार किया तो ऐसा कदम मिडिल ईस्ट में ईरान को अलग-थलग करने के लिए काफी है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग में तो भारत ने ईरान के पक्ष में वोटिंग की थी लेकिन क्या सामरिक फ्रंट पर भी अरब देशों के साथ मिलकर भारत ईरान की हिमायत में कोई फैसला लेगा. ये भी एक ऐसा मुद्दा होगा जिसपर खामेनेई की नजर होगी.

ईरान और अमेरिका के बीच संभावित टकराव से अरब देश भी डरे हुए हैं. अरब देशों को पता है कि अमेरिका को नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान सबसे पहले मिडिल ईस्ट में अमेरिका के मित्र देशों पर ही हमला करेगा. इस मीटिंग के ऐलान से जिसकी नींद उड़ी है. वो है पाकिस्तान का फील्ड मार्शल आसिम मुनीर. 

इस्लामिक नाटो!

मुनीर के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट्स में से एक है इस्लामिक नाटो बनाना. यानी इस्लामिक देशों का सामरिक गठबंधन खड़ा करना. मुनीर को खतरा है अगर भारत के साथ अरब देशों का सहयोग आगे बढ़ा तो इस्लामिक नाटो का ये नापाक प्लान कभी पूरा नहीं हो पाएगा. मुनीर के अंदर बैठी दहशत की दूसरी बड़ी वजह है पाकिस्तानी फौज के धंधे का चौपट हो जाना. हाल ही में मुनीर ने सऊदी अरब, लीबिया और सूडान जैसे इस्लामिक देशों को हथियार बेचने की डील की है. आधुनिक और घातक हथियार बनाने के क्षेत्र में पाकिस्तान से भारत कई मील आगे है. अगर कूटनीतिक चैनल्स के जरिए भारत ने सामरिक क्षेत्र में सहयोग या किसी डील को आगे बढ़ाया तो पाकिस्तानी फौज का खाद-पानी भी बंद हो जाएगा.

DIPLOMACY IN DELHI से किस पक्ष को बड़ी फिक्र हो रही होगी. अब हम आपको ये बताने जा रहे हैं, आखिर तनाव से भरे इस दौर में अरब देशों ने भारत में ही लामबंद होने का फैसला क्यों किया और 10 सालों तक जुदा रहने के बाद अरब देश भारत के इस बड़े मंच पर दोबारा लौटने के लिए मजबूर क्यों हुए?

पिछले तकरीबन 10 वर्षों से भारत ने अरब देशों और उनके पारंपरिक प्रतिद्वंदियों से रिश्तों में एक संतुलन बनाया हुआ है. ये संतुलन व्यापारिक से लेकर सामरिक मोर्चों तक मौजूद है. मिसाल के लिए भारत ने I-2-U-2 ग्रुप का हिस्सा बनने का फैसला किया. इस ग्रुप में इजरायल और UAE जैसे प्रतिद्वंदियों को साथ लाकर भारत ने मिडिल ईस्ट में एक ब्रिज की तरह काम किया है. इसी तरह IMEC नाम के आर्थिक गुट में भारत ने इजरायल के साथ सऊदी अरब, जॉर्डन और UAE जैसे इस्लामिक देशों को एक मंच पर लाने का काम किया है.

भारत ने अरब जगत और इजरायल के बीच जिन साझेदारियों को अंजाम दिया. उसकी वजह से अरब देशों के अंदर ये भरोसा पैदा हुआ कि भारत किसी पक्षपात का हिस्सा नहीं बनेगा. वो अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर आगे बढ़ेगा. भारत की इसी स्वतंत्र विदेश नीति की एक मिसाल उस वक्त देखने को मिली थी जब गाजा के लिए ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस बनाया था. चूंकि इस बोर्ड में फिलिस्तीन से किसी वरिष्ठ प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया था तो भारत ने इस बोर्ड से दूरी बनाकर रखी है. न्याय के प्रति भारत के इसी निश्चय की वजह से फिलिस्तीनी अथॉरिटी के प्रतिनिधि भी दिल्ली पहुंचे हैं. फिलिस्तीन के प्रतिनिधियों को भारत से बहुत उम्मीदें हैं . 

इन्हीं उम्मीदों और भरोसे की वजह से कहा जा रहा है कि DIPLOMACY IN DELHI कोई रूटीन कूटनीतिक आयोजन नहीं है. ये वो आयोजन है जो तनाव से भरे मिडिल ईस्ट को शांति का रास्ता दिखा सकता है. DNA के 29 जनवरी के संस्करण में हमने आपको बताया था किस तरह टेंशन से भरे माहौल के बीच भारत के डिप्टी NSA पवन कपूर तेहरान पहुंचे थे और वहां सामरिक मुद्दों से जुड़ी बातचीत में हिस्सा लिया था. मौजूदा तनाव में ईरान और अमेरिका पीछे हटने को राजी नहीं नजर आते लेकिन इस तनातनी में इजरायल की शक्ल में एक ऐसा पक्ष भी शामिल है जो भारत को काफी तवज्जो देता है. कब-कब इजरायल ने भारत के कहने पर टकराव की जगह शांति को स्वीकारा.ये भी आपको बेहद गौर से देखना और समझना चाहिए .

2024 में जब गाजा का युद्ध चल रहा था तो भारत ने ही इजरायल से रमजान के महीने में अस्थायी युद्धविराम की अपील की थी. इस अपील को इजरायल ने माना और रमजान में सैन्य अभियानों की तीव्रता कम कर दी गई थी. जून 2025 में जब इजरायल और ईरान एक दूसरे पर मिसाइल बरसा रहे थे तो भारत ने ही दोनों देशों को कदम वापस खींचने के लिए कहा था . भारत की पहल के बाद दोनों देशों ने हमलों पर ब्रेक लगाए थे. जुलाई 2025 में भारत ही वो देश था जिसने गाजा में अस्थायी की जगह स्थायी युद्धविराम का प्रस्ताव सामने रखा था . भारतीय प्रस्ताव के बाद इजरायल ने युद्धविराम पर संजीदगी से सोचना शुरु कर दिया था.

अरब देशों को उम्मीद है कि भारत के जरिए इजरायल को तनाव बढ़ाने से रोका जा सकता है. अगर इजरायल ने ऐसा किया तो शायद अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की आशंका कम हो जाए. शनिवार की सुबह जब अरब जगत जागेगा तो इन अरब देशों की अवाम यकीनन DIPLOMACY IN DELHI के परिणाम की प्रतीक्षा करती नजर आएगी.