
Chillai Kalan in Kashmir: जम्मू-कश्मीर समेत पूरा उत्तर भारत भारी ठंड की चपेट में है. कश्मीर की खूबसूरत पहाड़ियां जब बर्फ की सफेद मोटी चादर से ढकी हों. जब डल झील पर शिकारों के आसपास बर्फ जमी हो. जब हसीन वादियों में कुदरत के नजारे ‘जन्नत’ में होने का अहसास करा रहे हों. गुलमर्ग और सोनमर्ग समेत चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियों को देखने सैलानियों को हुजूम उमड़ा हो तो समझ जाइएगा कि वहा ‘चिल्लई कलां’ का दौर चल रहा होता है.
क्या होता है चिल्लई कलां?
चिल्लई कलां, 40 दिन का वो पीरियड होता है जब जम्मू-कश्मीर घनघोर ठंड की चपेट में होता है. यह समयावधि आमतौर पर 21 या 22 दिसंबर से शुरू होकर करीब 40 दिनों तक चलती है और जनवरी महीने के आखिर तक रहती है. इस दौरान पूरे कश्मीर संभाग में जबरदस्त ठंड पड़ती है. इन चालीस दिनों में इलाके का तापमान कई बार शून्य से बहुत नीचे चला जाता है. ‘चिल्लई कलां’ के दौरान जिस साल तेज ठंडक और भारी बर्फबारी नहीं होती है, तो माना जाता है कि इस सूखा पड़ा है.
ऐसे कटता है ये सीजन
इस समय कश्मीर के कई इलाकों में भारी बर्फबारी होती है. सड़कें, घरों की छतें और खेत मोटी बर्फ से ढक जाते हैं. कई बार बर्फबारी इतनी ज्यादा होती है कि पहाड़ी इलाकों और दूर-दराज के गांवों का संपर्क कट जाता है. झरने और झीलों का जम जाना भी ‘चिल्लई कलां’ की एक बड़ी पहचान माना जाता है.
नलों का पानी जम जाता है. कुछ जगहों पर तो पीने के पानी का इंतजाम करने के लिए नलों के पाइप पर खास इंतजाम किए जाते हैं तो कहीं पर अंगीठी पर बर्फ पिघलाकर लोग पीने के पानी का इंतजाम करते हैं. रातें बेहद ठंडी होती हैं और दिन में भी सूरज की किरणें यहां की ठंड को भेदकर आम लोगों को राहत नहीं दे पातीं. ऐसे मुश्किल हालातों में यहां के लोग बेहद हंसी खुशी के साथ इस चिल्लई कलां को सेलिब्रेट करते हैं.
इस दौरान स्कूल-कॉलेज आमतौर पर बंद रहते हैं. सर्दियों की छुट्टियां अक्सर बढ़ा दी जाती हैं. रोजमर्रा की जिंदगी भी थम सी जाती है. यहां तक कि लोगों का कामकाज भी धीमा पड़ जाता है. जगह-जगह बिजली और पानी की सप्लाई प्रभावित होती है, क्योंकि पाइप जम जाते हैं. ठंड से बचने के लिए लोग रिवायती कांगड़ी, मोटे ऊनी कपड़े, फेरन और रजाइयों का सहारा लेते हैं. घरों में अंगीठियां और हीटर जलाए जाते हैं ताकि सर्दी से राहत मिल सके.
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