Digvijay Singh statement: कांग्रेस के भीतर इन दिनों एक बयान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है. पार्टी के मीडिया और प्रचार विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा ने वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की टिप्पणी पर कड़ा तंज कसते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कांग्रेस को कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है. खेड़ा ने सवाल उठाया कि जिस संगठन का नाम नाथूराम गोडसे से जुड़ा रहा हो, वह महात्मा गांधी द्वारा स्थापित संगठन को क्या सिखा सकता है. उनके इस बयान ने पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह चर्चा को और हवा दे दी है.
संगठन की सहारे प्रधानमंत्री
यह विवाद तब शुरू हुआ जब दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 1990 के दशक की एक पुरानी तस्वीर साझा की है. इस तस्वीर में युवा नरेंद्र मोदी को वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के पास जमीन पर बैठे हुए देखा जा सकता है. दिग्विजय सिंह ने इस तस्वीर को साझा करते हुए RSS की संगठनात्मक ताकत की तारीफ की और कहा कि कैसे एक साधारण कार्यकर्ता संगठन के सहारे मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री तक बन सकता है. उन्होंने इसे संगठन की शक्ति बताया.
दिग्विजय सिंह की इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए पवन खेड़ा ने RSS की विचारधारा पर सीधा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक ऐसे विचार से जन्मी है जो गांधी जी के मूल्यों पर आधारित है, जबकि RSS का इतिहास और सोच उससे मेल नहीं खाती है. खेड़ा ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस को अपनी राह और अपने सिद्धांतों पर चलने की जरूरत है, न कि किसी दूसरे संगठन से सीख लेने की है.
RSS की विचारधारा के विरोधी
विवाद बढ़ने के बाद दिग्विजय सिंह ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि वह RSS की विचारधारा के विरोधी हैं, लेकिन उसकी संगठनात्मक क्षमता की सराहना करते हैं. उन्होंने कहा कि एक ऐसा संगठन, जो पंजीकृत भी नहीं है, फिर भी इतना प्रभावशाली बन गया कि देश के प्रधानमंत्री उसे दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ कहते हैं. उन्होंने संगठन की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसके बावजूद उसकी कार्यशैली पर ध्यान देना जरूरी है.
कांग्रेस की स्थिति पर बोलते हुए दिग्विजय सिंह ने माना कि पार्टी के संगठन में सुधार की गुंजाइश है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस मूल रूप से एक आंदोलन से निकली पार्टी है और उसे आंदोलन की भावना को बनाए रखना चाहिए। हालांकि, उस आंदोलन को वोटों में बदलने में पार्टी पीछे रह जाती है. इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर संगठन, विचारधारा और भविष्य की दिशा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जो आने वाले समय में और गहरी हो सकती है.
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