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दिल्ली दंगों की गहरी साजिश रचने के आरोप में 5 आरोपियों को तो जमानत मिल गई पर उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं. महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी पर UAPA के तहत ही मामला चल रहा है लेकिन कोर्ट ने आरोपियों की भूमिका को अलग-अलग देखा. उमर और शरजील की भूमिका सबसे अलग पाई गई. जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, ‘रिकॉर्ड से पता चलता है कि अपराध के मामले में सभी आरोपी समान स्थिति में नहीं हैं. मुख्य आरोपियों के खिलाफ आरोप कथित आतंकवादी कृत्य की साजिश रचने और सहयोग करने में एक केंद्रीय और निर्देश देने वाली भूमिका का संकेत दे रहे हैं जबकि कुछ सह-आरोपियों के खिलाफ सामग्री सहायक प्रकृति को दिखाती है.’

असल में कोर्ट ने जमानत के फैसले तक पहुंचने से पहले आरोपियों की एक हाइरारकी (पदानुक्रम) बनाई जबकि सभी पर समान आरोप थे. कोर्ट ने उनकी भूमिका को अलग-अलग समझा. सभी आरोपियों पर सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), शस्त्र अधिनियम और दंड कानून के तमाम प्रावधानों के तहत आतंकवाद के आरोप लगाए गए हैं. 

आतंकी कृत्य की परिभाषा

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इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में दो मुख्य मुद्दे रहे – पहला ‘आतंकवादी कृत्य’ कैसे पता चला और कौन इसे पूरा करता है और क्या ट्रायल शुरू होने से पहले लंबे समय तक जेल में रखना आतंकवाद विरोधी कानून के तहत उचित ठहराया जा सकता है? आरोपियों पर तत्काल असर के अलावा जमानत का यह आदेश ‘आतंकवादी कृत्य’ की एक व्यापक परिभाषा को भी स्वीकार करता है. 

‘किसी दूसरे माध्यम’ में फंसे दोनों

UAPA की धारा 15 किसी आतंकवादी कृत्य को ऐसे काम के रूप में परिभाषित करती है जो भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को खतरा पैदा करने या खतरा पैदा करने के इरादे से या भारत के लोगों या लोगों के किसी भी वर्ग में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के इरादे से किया गया हो. हालांकि इसमें आतंक फैलाने का मतलब ‘बम, डायनामाइट या दूसरे विस्फोटक पदार्थों या ज्वलनशील पदार्थों… या किसी दूसरे माध्यम’ के उपयोग से होता है. 

चक्का जाम vs दूसरे माध्यम

– अभियोजन पक्ष का कहना है कि ‘चक्का जाम’ भी ‘किसी दूसरे माध्यम’ की परिभाषा के तहत आएगा. खालिद और दूसरे आरोपियों ने कथित तौर पर चक्का जाम करने की साजिश रची थी. 
– उधर, खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क रखा कि लोकतंत्र में चक्का जाम या रोड ब्लॉकेड की बात करना विरोध का एक वैध रूप है. 
– आरोपियों की तरफ से रखे गए तर्क का मुख्य बिंदु यह है कि चूंकि यह प्रावधान हिंसक चीजों के इस्तेमाल की बात करता है इसलिए ‘किसी दूसरे माध्यम’ को केवल दूसरे हिंसक माध्यम के रूप में पढ़ा और समझा जाना चाहिए. 

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर फैसला करते समय इस परिभाषा की गहराई से जांच की और अभियोजन पक्ष की व्याख्या से सहमत हुआ. कोर्ट ने कहा, ‘जिन तरीकों से ऐसे काम किए जा सकते हैं, वे सिर्फ बम, विस्फोटक, फायरआर्म्स या दूसरे पारंपरिक हथियारों तक ही सीमित नहीं हैं. संसद ने जानबूझकर ‘किसी दूसरे तरीके से, चाहे वह किसी भी तरह का हो’ वाक्य का इस्तेमाल किया है और इस लाइन को बेकार नहीं माना जा सकता इसलिए कानूनी जोर सिर्फ इस्तेमाल किए गए हथियार पर नहीं, बल्कि काम के मकसद, इरादे और असर पर है.’ 

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