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Indian Army preparations against China: भारत से लगी सीमा पर शांति है. चीन की वैसी कोई सैनिक एक्टिविटी नहीं दिखी है, जैसा 5 साल पहले गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने किया था. तो क्या मान लिया जाए भारत चीन सीमा पर सबकुछ ठीक है? इस सवाल पर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन की रिपोर्ट चौंकाने वाली है. पेंटागन ने भारत-चीन सीमा पर शांति को ना सिर्फ एक भ्रम करार दिया है, बल्कि ये भी दावा किया है कि चीन ये शांति एक लंबी रणनीति के तहत कायम की है. यानी 1962 जैसा फिर से कोई औचक अटैक, या फिर साजिश कुछ और है? इस सवाल के साथ सबसे बड़ा सवाल ये कि भारत चीन की तरफ से ऐसे किसी खतरे के लिए कितना तैयार है? आइए आज अपनी स्पेशल रिपोर्ट में हम आपको ये पूरा समीकरण समझाते हैं. 

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल में पेंटागन की रिपोर्ट छपी है. ये रिपोर्ट कह रही है कि भारत की सीमा पर दुनिया को लगता है चीन शांति स्थापना की कोशिश कर रहा है. वह दशकों पुराने सीमा विवाद को सुलझाने को लेकर गंभीर है, तो इससे बड़ा भ्रम कुछ नहीं है. 

सीमा पर शांति को ‘पेंटागन’ ने क्यों बताया बड़ा भ्रम?

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चीन की सीमा का जिक्र आज पांच साल बाद भी होता है तो गलवान की वो भयावह तस्वीर जेहन में कौंध जाती है. लेह लद्दाख के उस इलाके में जिस तरह चीनी सैनिकों ने हमारे जवानों को घेर कर मारा था, वो सिर्फ एक घटना भर नहीं, बल्कि सबक था. 

सबक था कि चीन की पूरी सीमा तक यानी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश में चप्पे-चप्पे तक हमारी पहुंच होनी चाहिए. गलवान के मिले उस सबक को भारत ने जमीन पर साक्षात कर दिखाया है. जैसे लेह में श्योक टनल शुरू कर दी गई है. यह ऑल वेदर ओपेन टनल है. यानी हर मौसम में खुली रहने वाली सुरंग. पूर्वी लद्दाख में ये सुरंग कितनी बड़ी रणनीतिक महत्व वाली है, जिसे बीआरओ ने तैयार किया है. इसके बारे में आपको समझना चाहिए. 

श्योक टनल रेडी, चीन तक सीधी पहुंच

यह टनल 12 हजार फीट की ऊंचाई पर बनाई गई है. सुरंग की कुल लंबाई 982 मीटर है, यानी करीब 1 किलोमीटर लंबी. एवलांच और लैंडस्लाड की वजह अब इसके दोनों तरफ की सड़क बंद नहीं होगी. इस सुरंग की वजह से DS-DBO यानी दुर्बुक-श्योक दौलत बेग ओल्डी रोड  पूरे साल खुली रहेगी. DS-DBO रोड LAC के बेहद नजदीक है और गांवों तक पहुंच बनाती है. 

आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि बीआरओ ने कितने मुश्किल हालात में सर्दियों से पहले इस सुरंग का निर्माण करने का बीड़ा उठाया था, वह अब पूरा कर दिया है. अगर बीते पांच सालों की बात करें तो रक्षा मंत्रालय की अगुवाई में बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन ने पूरे एलएसी पर असंभव से लगने वाले कई प्रोजेक्ट्स पूरे किए हैं. 

5 साल में BRO का कमाल, LAC पर कई प्रोजेक्ट तैयार

BRO ने बीते पांच साल में सीमा तक सीधी पहुंच वाली 28 सड़कें तैयार की हैं. अकेले 2025 में ही 1125 किमी लंबी सड़कें बनाई गई हैं. इसके साथ ही दुर्गम इलाकों में सड़कों को जोड़ने वाले 93 ब्रिज बनाए जा चुके हैं. इसके साथ हवाई पहुंच देने वाले 4 हेलिपैड और सुरंगें भी तैयार हैं. 

दरअसल चीन पिछले दो दशकों से सीमा के उस पार अपना इंफ्रास्ट्रंक्चर मजबूत करने में जुटा है. इसी के बूते वो घुसपैठ से लेकर भारतीय जमीन पर दावा भी करता है. इससे निपटने के लिए भारत ने भी ड्रैगन की तरह दोहरी रणनीति अपनाई है. पहला सीमा विवाद पर आपसी बातचीत और दूसरी तरफ सीमा तक सीधी पहुंच के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण. 

LAC तक सीधी पहुंच वाले प्रोजेक्ट

चीन की सीमा अब हमारे लिए दूर दराज का इलाका नहीं, बल्कि फर्राटा भरती गाड़ियों से सीधी पहुंच वाला इलाका है. BRO ने अरुणाचल प्रदेश में सेला सुरंग बनाई है. यह दुनिया की सबसे ऊंची डबल लेन टनल है. यह सुरंग भी हर मौसम में खुली रहने वाली है. बीआरओ ने लेह में न्योमा एयरबेस बनाया है. इसका निर्माण 13,700 फीट की ऊंचाई पर हुआ है. इसके जरिए एलएसी तक हवाई मदद सीधी पहुंच सकती है. 

इसके अलावा आईसीबीआर यानी इंडो चाइना बॉर्डर रोड भी बनाई है. यह बीआरओ (BRO) का वो प्रोजेक्ट है, जिसके तहत सीमा पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कें, पुल और सुरंगें बनाई जा रही है. इसमें भारी भरकम मशीनरी से लेकर सेना अब 3-डी पेंटिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर रही है. इस तकनीक के जरिए कम इन्फ्रास्ट्रकचर बेहद कम समय में तैयार होता है. 

चेहरे पर मुस्कराहट लेकिन पीठ पीछे गहरी रणनीति

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन की रिपोर्ट भारत और चीन की जिस गहराती दोस्ती पर सवाल उठा रहा है, उसकी शुरुआत अक्टूबर 2024 में होती है. जब दोनों देशों ने सीमा पर से अपने सैनिक पीछे हटाने का समझौता किया था. तब से अब तक पीएम नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो बार मिल चुके हैं. आज भारत और चीन के बीच सीधी फ्लाइट्स और आसान वीजा की प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी. यहां तक चीन ने भारतीय सामानों की खरीददारी भी बढ़ा दी है. ऐसे वक्त में पेंटागन की रिपोर्ट हमें किस बात के लिए आगाह करती है.

डिप्लोमैसी में ये मान्यता आम है कि इसमें निजी रिश्ता एक सीमा से ज्यादा मायने नहीं रखता. इसमें हाथ मिलाने और मिलकर मुस्कुराने के बावजूद देशों की रणनीतियां एक दूसरे खिलाफ हो सकती है. भारत और चीन का रिश्ता इस मान्यता के कई दौर देख चुका है. गाहे बगाहे चीन का विदेश मंत्रालय और दूसरी एजेंसिया अरुणाचल प्रदेश को लेकर ऐसे स्टेटमेंट देती रहती हैं, जो भारतीय हितों के खिलाफ होते है.

‘दोस्ती’ के बीच चीन की स्ट्रेटजी 

ऐसे में पेंटागन की रिपोर्ट आगाह करती है कि चीन की मौजूदा दोस्ती और भरोसा भारत के लिए खतरनाक हो सकता है. पेंटागन की रिपोर्ट को एक सेकंड के लिए अगर भूल भी जाएं, तो भी ये बात दीगर है कि LAC पर चीनी सैनिकों की तैनाती में कोई कमी नहीं आई है. चीन अभी भी बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार कर रहा है. खासतौर पर अरुणाचल प्रदेश में गांवों को अपना बताता रहता है.

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इसके आलावा बॉर्डर से सटे इलाकों में चीन की आक्रामक सैन्य तैयारी भी जारी है. चीनी सैनिक लद्दाख में कब्जे वाले इलाकों में अभी भी काबिज हैं. ऐसा नहीं है कि पेंटागन की रिपोर्ट में सिर्फ चीन के भीतरघात की तरफ इशारा किया गया है. रिपोर्ट में इस तथ्य की भी सराहना की गई है कि जून 2020 में हुई गलवान की घटना के बाद भारत ने अभूतपूर्व गति से बॉर्डर के बुनियदी ढांचे तैयार किए हैं.

चीन से घात, कितने तैयार हम?

BRO यानी सीमा सड़क संगठन का बजट तीन गुना बढ़कर 81 मिलियन डॉलर हो चुका है. 729 करोड़ रु का खर्च सिर्फ सीमा पर सैन्य पहुंच आसान बनाने के लिए किया गया है. पहले एक आर्मी पोस्ट को जरूरी सामान पहुंचाने में कई दिन लगते हैं, अब घंटों में पहुंचता है. पहुंच आसान होने से सीमा पोस्ट और पेट्रोलिंग टीमों में भी खासी बढ़ोत्तरी हुई है.  पांच साल में हमारा कुल रक्षा बजट भी 60 फीसदी बढ़ा है, जिसमें बड़ा फोकस चीन से खतरे पर है.

यानी भारत की तैयारी पूरी है कि चीन चाहकर भी 1962 जैसा औचक हमला और गलवान जैसा घातक हमला दोबारा न कर सके. अगर किया भी तो अब हमारे जवान साजो सामान पहुंचने का इंतजार नहीं करेंगे, बल्कि संसाधन इतने दुरुस्त है कि जवाबी हमले में मिनट भर की भी देरी नहीं होगी.