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Supreme Court Harish Rana: हरिश राणा के माता-पिता की याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह मामला बेहद संवेदनशील है. कोर्ट ने साफ किया कि वह जीवन रक्षक इलाज हटाने के सवाल पर गंभीरता से विचार करेगा. अब पूरे देश की नजरें इस फैसले पर टिकी हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने हरिश राणा के पैसिव यूथेनेशिया मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस केस को नाजुक मुद्दा बताया है. सुनवाई से पहले जजों ने हरिश के माता-पिता से मुलाकात भी की थी. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में फैसला लेना आसान नहीं होता है. जजों ने टिप्पणी की कि हम सब इंसान हैं. यह तय करना बहुत मुश्किल है कि कौन जिए और कौन नहीं. कोर्ट ने यह भी कहा कि वह जीवन रक्षक चिकित्सा हटाने के विकल्प पर विचार करेगा.

माता-पिता की ओर से रखी गई बात
हरिश के माता-पिता की तरफ से अमीकस क्यूरी ने कोर्ट में उनकी बात रखी. उन्होंने बताया कि हरिश पिछले 13 साल से पूरी तरह कोमा की हालत में हैं और उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है. केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भी अपनी दलीलें पेश कीं थी. अब आने वाले समय में कोर्ट के फैसला ही तय करेगा की क्या होना है.

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कौन हैं हरिश राणा
हरिश राणा दिल्ली के रहने वाले हैं. साल 2013 में वह चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. 20 अगस्त 2013 को रक्षाबंधन के दिन वह अपने पीजी की चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए थे. इस हादसे में उनके सिर में गंभीर चोट आई थीं. डॉक्टरों ने बताया कि वह न तो आंखें खोल पा रहे थे और न ही शरीर का कोई हिस्सा हिला पा रहे थे.

बता दें कि हादसे के बाद से ही हरिश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. वह पूरी तरह से कोमा की स्थिति में हैं. सांस लेने के लिए उनके गले में पाइप लगी है. खाने के लिए पेट में ट्यूब डाली गई है. उनका ज्यादातर समय अस्पताल में ही बीत रहा है.

परिवार की मुश्किलें
हरिश के इलाज ने उनके परिवार को मानसिक ही नहीं आर्थिक रूप से भी तोड़ दिया है. लंबे इलाज के खर्च की वजह से माता-पिता को दिल्ली के महावीर एन्क्लेव में अपना घर बेचना पड़ा और गाजियाबाद शिफ्ट होना पड़ा है. इसके साथ ही उन्हें अपने दो अन्य बच्चों की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है.

कानूनी लड़ाई 
जब कई सालों तक हरिश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ तो उनके माता-पिता ने जुलाई 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उन्होंने पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत मांगी थी.  हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी थी. कोर्ट का कहना था कि हरिश किसी मशीन से पूरी तरह जुड़े नहीं हैं और उनका शरीर बुनियादी काम मेडिकल मदद से कर रहा है. कोर्ट ने यह भी कहा कि खाने की सप्लाई बंद करना एक्टिव यूथेनेशिया माना जाएगा जो भारत में गैरकानूनी है.

दोबारा सुप्रीम कोर्ट में गुहार
दिसंबर 2025 में हरिश के माता-पिता फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. उनका कहना था कि अब हालत और ज्यादा खराब हो चुकी है. उनके बेटे को बिना किसी उम्मीद के सिर्फ मशीनों और ट्यूब के सहारे जिंदा रखा जा रहा है. हरिश ने कोई लिविंग विल नहीं बनाई थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के नियमों के तहत दो मेडिकल बोर्ड बनाए थे. इन दोनों मेडिकल बोर्ड ने जांच के बाद कहा कि हरिश के ठीक होने की संभावना ना के बराबर है. उनकी हालत बेहद गंभीर है. 18 दिसंबर को जस्टिस जेबी पारदीवाला ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आज यानी 15 जनवरी को फैसला सुनाने की तारीख तय की थी.

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