Rajesh Pilot: हमारे देश में एक ऐसा भी नेता हुआ, जो कभी संसद की कैंटीन में दूध सप्लाई किया करते थे, लेकिन आसमान की बुलंदियों को छूते हुए वह राजनीति तक पहुंच गए और केंद्र सरकार में हाई प्रोफाइल मंत्री बन गए. भले ही नेता आसमान की बुलंदियों को छू रहा था, लेकिन इन्होंने कभी भी जमीन से अपना नाता टूटने नहीं दिया. यह नेता और कोई नहीं बल्कि पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और ‘किसानों के मसीहा’ रहे राजेश पायलट थे.
राजेश्वर प्रसाद से राजेश पायलट तक का सफर
राजेश पायलट का जन्म10 फरवरी साल1945 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में एक किसान परिवार में हुआ था. ‘मेरठ यूनिवर्सिटी’ से ग्रेजुएट राजेश सेना में भर्ती होना चाहते थे. इसके लिए वह कड़ी मेहनत करते थे. पढ़ाई के साथ-साथ राजेश दूध भी बांटा करते थे. वह मंत्रियों के घर पर दूध देने के बाद स्कूल जाते थे. भारतीय वायुसेना में 29 अक्टूबर 1966 को मिले कमीशन के साथ उनका सेना में भर्ती होने का सपना पूरा हुआ. एयरफोर्स में रहने के दौरान उन्हें राजनीति का चस्का लगा. इसके लिए उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ थामा. किस्मत ने उनका साथ दिया और 1980 में वे पहली बार भरतपुर से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीतकर सांसद बने. राजेश के राजनीति में आने के साथ क्षेत्र में हवा दौड़ चुकी थी कि इंदिरा गांधी किसी पायलट को भेज रही हैं. जब नामांकन पत्र दाखिल किया तो उन्होंने अपना असली नाम ही उसमें लिखा, लेकिन यह देख उनका एक समर्थक पीछे से बोला कि आपको राजेश्वर प्रसाद नाम से कोई नहीं जानता है, जहां सिर्फ पायलट की चर्चा है. उसी दिन उनका नाम राजेश्वर प्रसाद से नाम बदलकर राजेश पायलट हो गया.
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‘पार्टी में तीसरा ध्रुव बना रहे पायलट…’
खुद को किसानों का रहनुमा बताने वाले राजेश पायलट मंत्रालय से ज्यादा समय जनसभाओं यानी जनता के बीच बिताया करते थे. उस समय कांग्रेस में शायद ही कोई ऐसा नेता था, जो पायलट से अधिक जनसभाओं में गया हो. कांग्रेस के अभियान के समय उन्होंने लगभग देश के हर राज्य का दौरा किया था. उनकी पहचान ‘हवाई नेता’ के रूप में बन चुकी थी. देशभर के दौरे करने में वे इतने व्यस्त रहते थे कि विरोधी भी उन्हें ‘हवाई मंत्री’ कहने लगे थे. एक इंटरव्यू में राजेश पायलट ने कहा,’ कांग्रेस के लिए मदद करना हमारा फर्ज है. मैं इस बात को जरूर मानता हूं कि ये मेरी कमजोरी रही है, क्योंकि मैं पायलट रहा हूं तो फ्लाइंग का मुझे शौक रहा है.’ इंदिरा गांधी और संजय गांधी की उंगली थामकर राजनीति में आए राजेश पायलट ने जब राजनीति में लंबी उड़ानें भरने का सिलसिला शुरू किया था, तो उन्हें पीवी नरसिंह राव के क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का सदस्य माना जाता था, लेकिन उनके राजनीतिक विरोधी महज मौकापरस्त और अति महत्वाकांक्षी मानते थे. यहां तक कि उनके खुद के मंत्री कहते थे कि वे बहुत जल्द बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं. इन घटनाक्रमों को लेकर उन दिनों के अखबारों में ‘पायलट की कार्यशैली पर कांग्रेसियों ने विरोध जताया’ और ‘पार्टी में तीसरा ध्रुव बना रहे पायलट’ जैसी हेडलाइनों के साथ खबरें छपती थीं.
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अपने नेताओं के खिलाफ उतरे राजेश पायलट
राजेश पायलट कभी पार्टी में संकटमोचन की भूमिका निभाने वाले कहलाए तो कभी-कभी खुद प्रधानमंत्री के लिए संकट पैदा करते थे. किसानों की बात हो या जम्मू-कश्मीर की समस्या या पार्टी का अंदरूनी संकट, हर मामले को सुलझाने की कोशिश में खुद ही लगते रहे थे. यहां तक कि वे अपने मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री या अपने सीनियर मंत्री से भी भिड़ जाते थे. इंटरव्यू में राजेश पायलट ने खुद स्वीकार किया कि किसी खास विषय पर उनके अपने साथी मंत्रियों और नेताओं के साथ मतभेद रहे, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि पार्टी नेताओं और मंत्रियों से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी से व्यक्तिगत झगड़े नहीं थे. राजेश पायलट को जीप चलाने का शौक था. अपनी जीप वे अधिकतर खुद ही ड्राइव कर लेते थे. 11 जून 2000 को अपने चुनावी क्षेत्र दौसा से एक सभा से लौटते वक्त जयपुर हाईवे पर उनकी जीप एक ट्रॉले से टकरा गई, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए और उसी दिन सवाई मानसिंह अस्पताल में उनका निधन हो गया. (इनपुट- IANS)
