Why Brahmos 2.0 threat to Pakistan and China: ब्रह्मास्त्र सनातन के पुराणों में वर्णित ऐसा अस्त्र है. जिसे सबसे शक्तिशाली और विनाशकारी बताया गया है. किसी भी जंग में ब्रह्मास्त्र के इस्तेमाल का मतलब है. दुश्मन सेना का अंत करने वाला हथियार, इसे भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के साथ बनाया था. इसलिए इसे प्रलयास्त्र- यानी प्रलय लाने वाला अस्त्र भी कहा जाता है. यूं समझिए आज के विज्ञान का बहुत ही शक्तिशाली परमाणु बम. पौराणिक ग्रंथों का वो ब्रह्मास्त्र कुछ खास लोगों के पास होता था, जिसे खास तंत्र मंत्र से एक्टिव किया जाता था. आज की रिपोर्ट में हम जिस अस्त्र को ब्रह्मास्त्र कह रहे हैं, वो भी कुछ ऐसा ही है.
जिस अस्त्र ने पाकिस्तान के एयरस्पेस को चीरते हुए आतंकी ठिकानों पर कहर बरपाया, पहले उसका लोड जान लीजिए. ऑपरेशन सिंदूर जब लॉन्च हुआ, तब इस अस्त्र ने अपने पहले वर्जन का जो कहर दिखाया, उससे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया था.
‘ब्रह्मास्त्र’ वर्जन 1.00 का कहर
यूं समझिए, इस अस्त्र के प्रहार के आगे पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए. कैसे, पहले इसे समझिए.
1-मैक-3 की स्पीड से उड़ान
2-400 किमी दूर का टारगेट
3-लो रडार क्रॉस सेक्शन
4-टारगेट पर पिन प्वाइंट अटैक
ऑपरेशन सिंदूर में दिखाया ट्रेलर
अगर आपके लिए ये भाषा टेक्निकल है, तो हम आपको बता देते हैं, मैक-3 स्पीड का मतलब है आवाज की रफ्तार से तीन गुनी गति. लो रडार क्रॉस सेक्शन का मतलब है, इस अस्त्र के दुश्मन के रडार सिस्टम में दिखने की कम संभावना और पिन प्वाइंट अटैक का मतलब टारगेट पर अचूक निशाना.
इस अस्त्र के अचूक निशाने को आपने ऑपरेशन सिंदूर में देखा भी होगा. जब इन अस्त्रों ने अपनी देश की सीमा से ही पाकिस्तान के दर्जन भर ठिकानों को खस्ताहाल बना दिया था. अब आप इस अस्त्र का असली नाम जानने को जिज्ञासू होंगे, क्योंकि ब्रह्मास्त्र तो सिर्फ इसके लिए एक संज्ञा है.
असली नाम है हिंदुस्तान का ब्रह्मास्त्र यानी रूसी सहयोग से बना क्रूज मिसाइल. आपने ये नाम जरूर खबरों की सुर्खियों में सुना होगा, मगर इस नाम का मतलब बहुत कम लोग जानते होंगे. रूसी रक्षा कंपनी के सहयोग से बने इस मिसाइल का नाम दो नदियों ब्रह्मपुत्र और मोस्कवा
के नाम पर रखा गया है.
पहली बार पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल
ब्रह्मोस का पहला हिस्सा देश की सबसे लंबी नदी ब्रह्मपुत्र और दूसरा हिस्सा रूस की राजधानी मॉस्को के पास बहने वाली नदी मोस्कवा से लिया गया है. इस डीटेल के साथ ब्रह्मोस का बेसिक इंट्रोडक्सन तो पूरा हुआ, लेकिन इस ब्योरे के साथ जो जिज्ञासा बढ़ती है, वो ये, कि अपने पहले जंगी इस्तेमाल में ब्रह्मोस इतना कारगर कैसे साबित हुआ.
जी हां, पाकिस्तान के खिलाफ ब्रह्मोस मिसाइलों का जंगी इस्तेमाल पहली बार ही हुआ था, लेकिन इन्होंने इतने सटीक तरीके से निशानों को तबाह किया. जिसे देखकर मिसाइल बनाने वाली कंपनी के रूसी पार्टनर भी दंग रह गए.
इस मिसाइल ने जैसे नतीजे ऐसे दिए, कि भारत और रूस अपने कंबाइन्ड प्रोजेक्ट को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने की तैयारी कर चुके हैं. यानी अब चिंता पाकिस्तान और चीन दोनों को ही करनी है.
ब्रह्मोस को हिट्टाइल कहते हैं एक्सपर्ट
सोचिए, ब्रह्मोस के मौजूदा वर्जन ने करीब 100 घंटे के जंगी इम्तिहान में पाकिस्तानी सेनना और पूरे मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर की धज्जियां उड़ा दी, उस मिसाल का नया वर्जन कितना ताकतवर होगा. आपको बता दें, ये महज कल्पना नहीं, बल्कि ऐसी हकीकत है, जिससे पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों की नींदे उड़ी हुई है.
ये बात अब किसी से छिपी नहीं, कि चीन भारत के खिलाफ होने वाली जंग में पाकिस्तान का साथ देगा. इसका भरोसा वो दे चुका है. ऐसे में भारत का एक मिसाइल के साथ दोनों देशों के शहरों पर निशाना साधने में सक्षम होना उनके लिए बुरी खबर तो है ही.
ब्रह्मोस अपनी डिजाइन में शानदार है, अटैक में हाई स्पीड है और टारगेट को लेकर एक्यूरेसी परफ्केट है. इन्हीं खूबियों की वजह से दुनिया भर के वॉर एक्सपर्ट्स इसे हिट्टाइल कहते हैं. हिट्टाइल यानी हिट और मिसाइल को मिलाकर ब्रह्मोश के लिए बना नया शब्द.
खाड़ी युद्ध ने भारत को दिया सबक
भारतीय सेना को ऐसी मिसाइल की जरूरत 1990 के दशक में महसूस हुई. ये दौर था खाड़ी संकट का, जिसमें इराक और अमेरिका के बीच सबसे ज्यादा सुर्खियों में थी क्रूज मिसाइल्स.
तब भारत और रूस के बीच ऐसी ही क्रूज मिसाइलों की डील 1998 में हुई,इसके लिए दोनों देशों ने ब्रह्मोस एरोस्पेस समझौते पर दस्तखत किए. तब इस मिसाइल की सूरत क्या होगी, ये कितनी दूर तक मारक और इसकी खासियत क्या होगी. इसकी डिटेल क्लीयर नहीं थी लेकिन इतना तय था कि दोनों देशों के सहयोग से जो भी मिसाइल बनेगी, वो अपने आप में अनूठी होगी.
कैसे डेवेलप हुआ BrahMos?
ब्रह्मोस का पहला टेस्ट 12 जून 2001 को चांदीपुर में हुआ. उसने स्पीड, अटैक और एक्यूरेसी के पैमानों पर उस दौर की दूसरी क्रूज मिसाइलों को पीछे छोड़ दिया. इसे लेकर रूस से डील हुई थी. उसके मुताबिक, भारत की तरफ से DRDO और रूसी कंपनी NPOM इसका निर्माण करेंगे. मिसाइल के निर्माण में भारत की हिस्सेदारी 50.5% और रूस की 49.5% होगी. यानी इस डील में सहयोग रूस का होगा, लेकिन तकनीकी लीड भारत का होगा.
इसी हिस्सेदारी के मुताबिक 1999 में प्रोजेक्ट के लिए 150 मिलियन डॉलर का फंड बना. मकसद था ऐसे क्रूज मिसाइल के निर्माण का जो सुपरसोनिक हो, यानी आवाज की गति से तेज चलने वाला. जून 2001 में सफल परीक्षण के बाद उसी साल पहली बार ब्रह्मोस को रूस की रक्षा प्रदर्शनी में शामिल किया गया.
ब्रह्मोस मिसाइल की पूरी तकनीक क्रूज सिस्टम पर है. ये सतह से सतह पर, सतह से हवा में टारगेट को निशाना बना सकती है. एक बार टारगेट किए जाने के बाद ये सबसे पहले हवा में जाती है. फिर हवा से ही सतह पर अपने फिक्स किए गए टारगेट को निशाना साधती है.
दुश्मन के रडार के पकड़ में नहीं आती
ये मिसाइल दुश्मन देशों के रडार की पकड़ में नहीं आती. ये जरूरत के मुताबिक कम ऊंचाई पर भी उड़ान भर सकती है. आसमान में इतनी ऊंची, कि किसी को भनक तक नहीं लगे. ये मिसाइल वहीं से अपने टारगेट को भेद सकती है.
पूरी दुनिया में क्रूज मिसाइलों का निर्माण इसी मकसद से किया जाता है, ताकि ये अपने साथ वॉरहेड या यानी विध्वंसक सामग्री को लंबी दूरी तक ले जा सकें. ब्रह्मोस इस पैमाने पर इसलिए भी खास है, क्योंकि ये दुनिया की सबसे तेज रफ्तार मिसाइलों में से एक हैं.
नए मॉडिफिकेशन के बाद तो ये मिसाइल और भी मारक और घातक हो जाएगी. ब्रह्मोस का मौजूदा मारक रेंज 400 किमी है. जिसे अपग्रेडेशन के बाद 800 किमी तक बढ़ाने का प्लान है. यानी आज का सुपरसोनिक ब्रह्मोस, आने वाले दिनों में हाइपरसोनिक होजाएगी. यानी आवाज की गति से 5 गुना ज्यादा.
ब्रह्मोस बनेगा दोगुना पावरफुल, होंगे 5 बड़े बदलाव!
ये मिसाइल सिर्फ गति और रेंज बढ़ाने से ही घातक नहीं होगी बल्कि इसके पांच फैक्टर और भी हैं. इसे आप इस इन्फोग्राफिक्स के साथ समझिए.
1- हाइपरसोनिक स्पीड
इसमें आवाज से 5 गुना ज्यादा स्पीड होगी.
2- वजन कम ताकत ज्यादा
नये वर्जन में इसका वजन 2000 किलो घटेगा. जिससे ये राफेल, सुखोई और तेजस जैसे विमानों में फिट हो सकेगी.
3- ज्यादा भारी वॉरहेड
अभी ये मिसाइल 300 किलो का वॉरहेड ले जाती है. अगले वर्जन में वॉरहेड 500 किलो का हो सकता है.
4- तीनों सेनाओं का हथियार
अभी तक इसका इस्तेमाल थल और वायुसेना करती थी. नए और हल्के वर्जन का इस्तेमाल पनडुब्बियों में भी होगा.
5. दोगुनी रफ्तार
नए वर्जन में इसकी रफ्तार 800 किमी तक होगी यानी चीन और पाकिस्तान के सैन्य ठिकाने सीधे निशाने पर होंगे.
ब्रह्मोस के निर्माण में 84 फीसदी हुई हिस्सेदारी
रूस के सहयोग से बनी इस मिसाइल को लेकर सबसे बड़ी गुड न्यूज ये है कि अब इसके निर्माण में भारत की हिस्सेदारी 84 फीसदी हो गई है. यानी इसकी तकनीक से लेकर कल पुर्जों तक भारत की हिस्सेदारी निर्णायक रूप से अहम हो चुकी है.
इसका मतलब ये हुआ कि ब्रह्मोस का निर्माण भारत अपनी जरूरतों के मुताबिक खुद कर सकता है. अभी भारत में ब्रह्मोस मिसाइलों की संख्या 200 के करीब है. हालांकि नई तकनीक के साथ इसका घातक बेड़ा जल्द ही बड़ा होने वाला है.
