Sharad Pawar Politics: महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा छत्रप शरद पवार को यूं ही महाराष्ट्र की राजनीति का सियासी चाणक्य नहीं कहा जाता. 85 की उम्र और 50 साल का सक्रिय पॉलिटिकल करियर, बारामती से आने वाले सर्वमान्य नेता ने एक बार फिर क्षेत्र की जनता को बता दिया है कि भले ही उनका लाड़ला अजित आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आधी सदी तक उन्होंने जिन लोगों की सेवा की है, जिनके सुख-दुख का हिस्सा बने हैं, वो अब भी अनाथ नहीं है, उनके हितों की चिंता करने वाला अभी थका और बूढ़ा नहीं हुआ है.
सतारा में गरदे शरद पवार
85 साल से सियासत में सक्रिय शरद पवार को उस वक्त सबसे बड़ा सदमा लगा जब उनके भतीजे अजित पवार की एक विमान दुर्घटना में दुखद मृत्यु हो गई. 2026 में अपने रिटायरमेंट का ऐलान कर चुके सीनियर पवार ने जनता को बता दिया है कि जिस अजित के भरोसे वो कभी पूरे क्षेत्र की चिंता के लिए निश्चिंत रहते थे, उसके ना रहने के बाद भी बारामती अनाथ नहीं हुई है. अपने लोगों की हितों की रक्षा के लिए वो प्रतिबद्ध हैं और अपनी आखिरी सांस तक उनके हितों के लिए लड़ते रहेंगे.
टाइगर जिंदा है
ऐसे समय जब कहा जा रहा है कि एनसीपी के दोनों धड़ों का विलय होने जा रहा था. अजित का निधन, पवार परिवार के लिए बड़ा सदमा था लेकिन सियासत के चाणक्य ने अपनी निजी क्षति को अपने लोगों के हितों के ऊपर हावी नहीं होने दिया. अजित पवार की मौत की खबर आने के चंद घंटों बाद वो टीवी स्क्रीन पर लौटे. जब उनके इलाके के लोग परिवार के मुखिया को उस दुख की घड़ी में अजित पवार के निजी स्वजनों के साथ देखने की उम्मीद कर रहे थे, ऐसे में उनका टीवी पर आना कई लोगों को चौंका गया. शरद पवार ने अपने परिवार के सियासी गढ़ बारामती में नीरा नदी के किनारे का दौरा करके बता दिया कि टाइगर अभी जिंदा है.
कैसे दिया संकेत?
एक नेता यानी जनप्रतिनिधि के तौर पर कागजों में तो शरद पवार नदी में बढ़ते प्रदूषण की मात्रा को चेक करने पहुंचे थे और उन्होंने ठीक वैसा ही किया. सीनियर पवार ने नदी की हालत पर नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन से फौरन नदी को साफ करने और दोबारा गंदी न होने देने के लिए एक्शन लेने की मांग की.
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— Goldy Srivastav (@GoldySrivastav) January 31, 2026
सतारा में बारिश वाला भाषण
पहले एनसीपी में हुए बंटवारे फिर अजित पवार की मौत के बाद जहां दुनिया NCP के दोनों धड़ों के फिर से एक होने की अटकलों और चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे वक्त में नीरा नदी का दौरा शरद पवार का जाना-पहचाना पुरानी सियासी अंदाज था. बारामती के मुश्किल सियासी माहौल में परिवार के मुखिया ने बता दिया है कि वो एक्टिव हैं, थके नहीं हैं, प्रासंगिक हैं और अपने भतीजे की मौत के बाद होने वाले जरूरी बदलाव में फैसले लेने में पूरी तरह सक्षम हैं. सतारा की बारिश और अरब सागर का तूफान भी न उन्हें कभी रोक सका था और ना आगे रोक सकेगा.
राजनीति की इस चकाचौंध भरी लेकिन अनगिनत रियलिटी टेस्ट की कसौटी पर कसी जाने वाली सियासत एक अलग दुनिया है. यहां खुद को जनसेवक कहने वाले पार्षद, विधायकों और सांसदों को पल-पल अग्नि परीक्षा से गुजरना होता है. बहुत कम नेता होते हैं जो सुशिता की कसौटी पर खरे उतरते हैं.
अरब सागर की वो घटना
तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और देश के रक्षा मंत्री के पद की जिम्मेदारी निभा चुके शरद पवार ऐसे ही नेता हैं जिन्होंने महज एक तस्वीर से बता दिया कि जनता अनाथ नहीं हुई है. ‘एक तस्वीर हजार शब्द कह देती है’, एनसीपी संस्थापक ने कई बार अपने सामर्थ्य से बताया है कि वो आज भी सियासत के चंद सबसे मजबूत नेताओं में से एक हैं.
भजीते ने बचाई थी चाचा की कुर्सी, खतरे में था रक्षा मंत्री का पद; सियासत का अनसुना किस्सा
वो साल था 1991. लोकसभा चुनावों का बिगुल बज रहा था. राजीव गांधी की हत्या ने देशभर के सियासी समीकरण बदल दिए थे. कांग्रेस जीती. नरसिम्हा राव पीएम बने तो उन्होंने क्षेत्रीय क्षत्रपों को कैबिनेट में जगह दी. तब शरद पावर को देश के रक्षा मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली. इसमें तकनीकि समस्या ये थी कि वे तब संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. वो महाराष्ट्र की विधानसभा में बारामती से विधायक तो थे, लेकिन संविधान के अनुसार छह माह के भीतर सांसद या राज्यसभा सांसद बनना जरूरी था.
उस दौर में भतीजे अजित ने चाचा की कुर्सी पर आए खतरे को कैसे टाला आइए बताते हैं. अजित उस समय पहली बार सांसदी का चुनाव लड़े और बारामती लोकसभा सीट से जीतकर सांसद बनकर दिल्ली पहुंच चुके थे. जब चाचा की कुर्सी पर बात आई तो अजित ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी संसदीय सीट छोड़ दी. उधर शरद पावर ने विधायकी छोड़ दी. नवंबर 1991 में बारामती में दो उपचुनाव हुए, एक लोकसभा के लिए और दूसरा विधानसभा के लिए. नतीजा ठीक वही निकला जैसा चाचा शरद पवार और भतीजे अजित ने सोचा था.
आगे शरद पवार रक्षा मंत्री बने तो उनकी अरब सागर में सेना के बीच की एक तस्वीर ने उस दौर में अखबारों की सुर्खियां बटोरी थी तब देश में लोगों के पास मोबाइल नहीं थे, इंटरनेट नहीं था. खबरों को जानने के लिए अखबार भी एक मात्र विश्वसनीय साधन था. क्योंकि टीवी भी तब गिने चुने घरों में होते थे और उसमें भी आधा-आधा घंटे के समाचार प्रसारित होते थे.
उस समय शरद पवार ने अरब सागर में चल रही ‘जैकस्टे’ एक्सरसाइज में हिस्सा लिया था. जिसमें वो दो चलते हुए वॉरशिप के बीच नजर आए थे. उन तस्वीरों में एक मंत्री ऐसे लीडर के रूप में दिखा, जिसने सीमा पर तैनात सैनिकों की मुश्किलों को समझने के लिए दिल्ली के आरामदायक दफ्तर को छोड़ दिया था.
