
Why there controversy over kite flying in Gujarat: मजहब के नाम पर सियासत लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है. जितना सांप्रदायिक सौहार्द्र के नाम पर वैचारिक पाखंड. जब हिंदू त्योहारों और धार्मिक स्थलों पर मुसलमानों के प्रवेश को वर्जित करने की मांग उठती है तो इसे भाईचारे के लिए खतरा बताया जाता है. सांप्रदायिक सौहार्द्र की दुहाई दी जाती है. लेकिन जब कोई मौलाना लाउडस्पीकर पर कहते हैं कि गैर-मुस्लिमों के त्योहार में जाना पतंग उड़ाना इस्लाम के खिलाफ है. हराम है. तो क्या इसे सांप्रदायिक सौहार्द्र कहा जाएगा? इसे हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कहा जाएगा? ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.जिसमें मुसलमानों में पतंग न उड़ाने की अपील की जा रही है.
‘इस्लाम का मजाक न बनाएं’
ये ऐलान अहमदाबाद के बेहरामपुरा इलाके की मस्जिद से किया गया. वीडियो के आखिर में कहा गया कि ये अपना त्योहार नहीं है और इस्लाम का मजाक न बनाएं. यहां सवाल उठता है, क्या पतंग उड़ाने से इस्लाम का मजाक उड़ता है? ये ठीक है कि मकर संक्रांति मुस्लिमों का त्योहार नहीं है. लेकिन इस अवसर पर पतंग उड़ाना इस्लाम का मजाक बनाना कैसे हो गया?
पतंगबाजी को गैर इस्लामिक बताना अकेला मजहबी अवसरवाद नहीं है. इसके अनेकों उदाहरण हैं. पतंगबाजी को हिंदुओं का त्योहार बताकर फतवा जारी करने वाले मौलवी-मौलाना कभी गरबा महोत्सव में जाने के खिलाफ मुस्लिम युवकों को हिदायत क्यों नहीं देते. तब फतवा जारी क्यों नहीं किया जाता है.
पतंगबाजी पर ‘फतवा’ तो कुंभ में एंट्री की मांग क्यों?
हिंदुओं के महापर्व महाकुंभ में जब मुस्लिम दुकानदारों की एंट्री को बैन करने की मांग हुई. तब इनका दीन-ईमान कहां चला गया था. हिंदुओं के सबसे बड़े धार्मिक जमघट में जाने के खिलाफ फतवा क्यों नहीं जारी किया जाता. तब व्यापार का तर्क क्यों दिया जाता है. उस वक्त कहते हैं कि इससे भाईचारा खतरे में पड़ जाएगा और अब क्या होगा.
मंदिरों के बाहर दुकान लगाने की जिद क्यों?
हिंदू मंदिरों के बाहर प्रसाद बेच रहे मुस्लिम दुकानदारों को हटाने की जब मांग आती है. तब ये सामाजिक सौहार्द का हवाला देने लगते हैं. लेकिन यही लोग आज पतंगबाजी को हिंदू त्योहार बताकर इसके खिलाफ फतवा जारी कर रहे हैं. इसे इस्लाम का मजाक करार दे रहे हैं. ये घोर मजहबी अवसरवाद है.
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— Zee News (@ZeeNews) January 17, 2026
पतंगबाजी के खिलाफ जब इस फतवे का मुद्दा उठाया जा रहा है. तो देशभर के मुल्ला मौलवी किसी न किसी तरह से पतंगबाजी को गैर इस्लामी साबित करने में जुट गए हैं.
पतंग की डोर पर मजहब का रंग क्यों चढ़ाया जा रहा है.उसकी एक बहुत बड़ी वजह है.पतंग से कट्टरपंथियों को इतना डर क्यों लगता है. आज हम आपको इसका इतिहास भी बताने वाले हैं. लेकिन उससे पहले आपको ये जानना चाहिए कि जिस पतंग को इस्लाम के खिलाफ बताया जा रहा है. उसे इस्लामिक वर्ल्ड में काफी पसंद किया जाता रहा है.
पतंगबाजी का इतिहास कब से शुरू हुआ?
सबसे पहले तो आपको पतंग शब्द का ही इतिहास जान लेना चाहिए.. ‘पतंग’ शब्द की जड़ें फ़ारसी भाषा में हैं. वैसे तो पतंग का आविष्कार चीन में हुआ लेकिन 1250 ईस्वी में ये काहिरा से लेकर दुबई तक काफी लोकप्रिय हुई. तुर्क और मंगोलों ने इसे दुनिया भर में फैलाया.
मुगल काल में भी भारत में पतंगबाजी काफी प्रचलित थी. मुगल बादशाह अकबर, जहांगीर और शाहजहां पतंगबाजी के शौकीन थे. सूफी दरगाहों पर पतंग उड़ाना काफी लोकप्रिय था. जैसे निजाम औलिया या ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाहों पर पतंगबाजी का आयोजन किया जाता था.
अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी पतंगबाजी काफी प्रचलित थी. जब ये दोनों मुल्क कट्टरपंथ की बेड़ियों में जकड़ते गए तो इसे गैर इस्लामिक घोषित कर दिया गया.
इस्लामिक वर्ल्ड को दिक्कत नहीं लेकिन…
आज की तारीख में भी इस्लामिक देशों में पतंगबाजी का जबरदस्त प्रचलन है. मुस्लिम देश यूएई के बड़े शहर दुबई में हर साल काइट फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है. कतर में तो राष्ट्रीय दिवस के मौके पर हर साल काइट फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है. इसी तरह सऊदी अरब के जेद्दाह और रियाद में पतंगबाजी एक चर्चित स्पोर्ट है. जॉर्डन और लेबनान में भी पतंगबाजी पर्यटन का आकर्षण है.
इस्लामिक वर्ल्ड को पतंगबाजी से कोई परेशानी नहीं है. परेशानी है तो सिर्फ कट्टरपंथियों को. लेकिन क्यों? आपको इसका इतिहास आज जानना चाहिए. जिसका जिक्र लाहौर की यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के एक रिसर्च पेपर में भी मिलता है.
पतंगबाजी से क्यों डरते हैं जिहादी?
सन 1734 में लाहौर में 13 साल के हिंदू लड़के हकीकत राय को ईशनींदा के आरोप में मौत की सजा दे दी गई थी. इस सजा के खिलाफ लाहौर में हिंदुओं ने पतंग उड़ाकर अपना विरोध जताया था. लाहौर में कई दिनों तक पतंगबाजी के जरिये विरोध प्रदर्शन किया गया था.
आज भी पाकिस्तान में पतंगबाजी से कट्टरपंथी इतना डरते हैं कि साल 2025 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पतंगबाजी पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून लागू कर दिया गया. वहां पर ये एक गैर जमानती अपराध है. अब पतंगबाजी के खिलाफ कट्टरपंथ वाली ये सोच भारत में भी घुसती जा रही है. मस्जिदों के लाउडस्पीकर से इसके खिलाफ फतवा जारी किया जा रहा है. लेकिन पतंग के खिलाफ फतवा वाली ये सोच कट्टरपंथियों के मजहबी अवसरवाद को जगजाहिर कर रही है.
