आजादी मिल चुकी थी. पहली 26 जनवरी बीती ही थी कि 30 जनवरी की शाम प्रार्थना सभा में एक शख्स ने गांधीजी की गोली मारकर हत्या कर दी. उनका हत्यारा पुणे का रहनेवाला था, जिसने उन्हें गोली मारने के तुरंत बाद आत्मसमर्पण कर दिया. उस पर मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई लेकिन सजा सुनाए जाने से पहले उसने अपने कृत्य को सही ठहराते हुए एक भाषण दिया. नाथूराम गोडसे ने दावा किया कि उसके गुस्से का मुख्य कारण ये था कि एक सिद्धांत के रूप में महात्मा लगातार मुसलमानों का पक्ष ले रहे थे. मुसलमानों के समर्थन में किए गए उनके अंतिम उपवास ने ही आखिरकार मुझे इस नतीजे पर पहुंचाया कि महात्मा के वजूद को अब तुरंत खत्म कर देना चाहिए.
रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘भारत: गांधी के बाद’ में लिखते हैं कि गांधी की मृत्यु से पूरा देश दुख के अथाह सागर में डूब गया. अल्बर्ट आईंस्टीन जैसे लोगों ने गांधीजी की मृत्यु पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने बहुत पहले गांधीजी को 20वीं सदी का सबसे महान व्यक्ति घोषित किया था. नोबेल विजेता नाटककार जॉर्ज बर्नाड शॉ ने कहा कि गांधी की हत्या बताती है कि अच्छा होना कितना खतरनाक है. एक हल्की सी प्रतिक्रिया मोहम्मद अली जिन्ना की तरफ से आई. जिन्ना ने कहा था कि मेरे पुराने प्रतिद्वंद्वी की मृत्यु से ‘हिंदू समाज को गहरी क्षति’ पहुंची है.
नेहरू-पटेल बोले, गुरु का संदेश जिंदा है
पटेल भारत के गृहमंत्री थे. वह 1918 से गांधीजी के साथ थे. जवाहरलाल नेहरू बाद में गांधीजी से मिले थे. हालांकि नेहरू का महात्मा के साथ एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव था. कई मायनों में वह उनके सबसे प्रिय पुत्र और उनके चुने हुए राजनीतिक उत्तराधिकारी थे. हालांकि गांधी जी की हत्या के बाद अब देश गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा था. दोनों नेताओं ने देश की जनता से अपील की कि भले ही उनके गुरु इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका संदेश जिंदा है.
शर्म की बात है… पटेल ने रेडियो पर कहा था
महात्मा की मृत्यु के तुरंत बाद ऑल इंडिया रेडियो पर बोलते हुए पटेल ने लोगों से कहा कि वे बदला लेने की बात न करें बल्कि महात्माजी के दिए गए प्रेम और अहिंसा के संदेशों को ग्रहण करें. यह हमारे लिए शर्म की बात है कि दुनिया के सबसे महान आदमी को अपनी जान की कीमत उस पाप के लिए चुकानी पड़ी जो पाप हमने किया है. जब वे जीवित थे, तब हमने उनकी बातों पर अमल नहीं किया. अब कम से कम उनके मरने के बाद हमें उनकी बातों पर अमल करनी चाहिए.
अस्थि विसर्जन के बाद नेहरू बोले
गांधी जी की चिता की राख को गंगा में प्रवाहित करने के बाद इलाहाबाद में नेहरू ने कहा कि हमने बहुत ही महंगे मूल्य पर अपना सबक सीखा है. क्या हमारे बीच कोई ऐसा है जो गांधी की मृत्यु के बाद उनके मिशन को पूरा करने से इनकार करेगा? नेहरू ने कहा कि हिंदुस्तानियों को एक होकर उस सांप्रदायिकता के भयानक जहर के खिलाफ लड़ाई लड़नी है, जिसने हमारे युग के सबसे महान इंसान को हमसे छीन लिया है.
शायद दंगा, बंटवारा और बापू पर गोली भी न चलती
ब्रिटिश राजनीतिक विचारक और लेखक लियोनार्ड वुल्फ ने 1967 में कहा था कि इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिटिश सरकार जिस बात के लिए 1947 में राजी हो गई, उसे 1940 में दे दी होती तो भारत को कई बुरी दुर्घटनाओं से होकर नहीं गुजरना पड़ता. उन मुसीबतों, नफरतों, हिंसा, कैद, आतंकी घटनाओं, हत्याओं, यातनाओं, गोलीबारी, कत्लेआम और यहां तक की नस्लीय नरसंहारों का नौवां दसवां हिस्सा भी यहां घटित नहीं होता जो इसे झेलना पड़ा. सत्ता का हस्तांतरण, शांतिपूर्वक और बंटवारे के बिना भी हो जाता.
(तस्वीर सोशल मीडिया से ली गई है, इसमें राजपथ (अब कर्तव्य पथ) से होकर जाती गांधी जी की अंतिम यात्रा में उमड़ी हजारों की भीड़ दिखाई दे रही है)
