महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम अजित पवार के प्लेन क्रैश में दुखद निधन के बाद एनसीपी के मर्जर की चर्चाएं तेज हो गई थीं. 28 जनवरी को निधन हुआ और 29 को अंतिम संस्कार किया गया. 30 जनवरी को अजित पवार के बेटों ने अपने पिता की अस्थियां नदी में विसर्जित कीं. अगले ही दिन अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार शाम को डिप्टी सीएम पद की शपथ लेती हैं और आज सुबह सूत्रों के हवाले से पता चला है कि अजित के बेटे जय पवार को राज्यसभा में भेजा जाएगा. सूत्रों का कहना है कि BJP पार्थ पवार के पक्ष में नहीं है.
भाजपा जय पवार के नाम पर सहमत है लेकिन पार्थ पर नहीं क्योंकि पार्थ पवार पर पहले ही एक जमीन घोटाले में आरोप लग चुके हैं. हालांकि यह समझना महत्वपूर्ण है कि जब शरद पवार और अजित पवार गुट के नेता मर्जर की बातें कर रहे थे तो दो दिन के अंदर ही शपथ ग्रहण और बेटे को राज्यसभा में भेजना का फैसला क्यों लिया गया?
इतनी जल्दबाजी में क्यों है भाजपा?
Zee 24 Taas के डिजिटल एडिटर प्रशांत अरुण जाधव इनसाइड स्टोरी बताते हैं कि दोनों गुटों के बीच सकारात्मक चर्चा बिल्कुल चल रही थी. पहले के कुछ वीडियो भी सामने आए जिसमें शरद पवार केंद्र में और बगल में अजित पवार बैठे दिखते हैं. शरद पवार ने कहा भी कि अजित की इच्छा थी कि दोनों गुट एक हो जाएं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या भाजपा नहीं चाहती कि दोनों गुट एक हों?
1. अगर शरद पवार और अजित का गुट एक होता है तो भाजपा के लिए चुनौती पैदा हो सकती है जो अलग-अलग रहने पर नहीं होगी क्योंकि अजित का खेमा उनके साथ बना रहेगा. वैसे भी अजित के साथ वाले प्रफुल पटेल जैसे नेता भाजपा के पक्ष में झुकाव रखते हैं. एक होने पर शरद पवार के हाथ में पावर जाती फिर भाजपा के लिए उन्हें साधना मुश्किल हो जाता. शरद पवार ने कहा भी कि दोनों पार्टियां साथ आना चाहती हैं लेकिन उसमें भाजपा का कोई सवाल नहीं था यानी ऐसा तर्क लगाया जा रहा है कि क्या दोनों गुट साथ आते तो अजित सरकार छोड़ देते? अगर ऐसा होता तो शिंदे गुट हावी हो जाता. यह डर भाजपा को बना हुआ है शायद इसीलिए भाजपा जल्दबाजी में है.
भाजपा नहीं चाहती, एनसीपी का मर्जर हो?
2. भाजपा के राजनीतिक हित में यही ठीक है कि दोनों एनसीपी खेमा अलग-अलग रहे. सुनेत्रा पवार को जल्दबाजी में डिप्टी सीएम बनाया गया कि शायद उनके पूरे परिवार में भी चर्चा नहीं हो पाई थी. शरद पवार ने कहा भी कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है. भले ही दोनों गुट अलग हैं लेकिन इस दुखद घड़ी में सारा परिवार तो एक साथ होगा. अगर सच में सुनेत्रा पवार का डिप्टी सीएम बनना शरद पवार को नहीं पता था तो साफ है कि दोनों गुटों में दरार आज भी है.
3. भाजपा की बड़ी चिंता एकनाथ शिंदे भी हैं. अजित पवार के निधन के बाद कहा जा रहा था कि वही शिंदे को भाजपा की तरफ से साधते थे क्योंकि एकनाथ शिंदे को टफ बार्गेनर माना जाता है. वह जल्दी किसी चीज पर राजी नहीं होते. बीएमसी में मेयर पद को लेकर जो तनातनी देखी जा रही थी उससे बचने के लिए शायद भाजपा चाह रही थी कि उसके पास अजित पवार के गुट का साथ बना रहे जिससे सरकार के पास बिना शिंदे के भी नंबर बना रहे.
4. प्रशांत कहते हैं कि महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ सरकार में शामिल भाजपा और शिवसेना हिंदुओं के मुद्दे उठाती है लेकिन अजित पवार की पार्टी सेक्युलर मुद्दा उठाती रही है, ऐसे में मुस्लिम वोट उनके साथ बने रहे हैं. वह कहते रहे हैं कि हम फुले-शाहू-आंबेडकर के विचार मरने नहीं देंगे. यही वजह है कि मुस्लिम ठाकरे या कांग्रेस या एनसीपी के दूसरे धड़े के पास नहीं जाएंगे. यह सोची समझी राजनीति का हिस्सा है.
5. वित्त मंत्रालय अजित पवार के पास था लेकिन मौजूदा स्थिति में उनके गुट में ऐसा कोई मजबूत नेता नहीं था तो यह जिम्मेदारी संभाल सके. ऐसे में इस बार सीएम खुद बजट पेश करने वाले हैं. इस तरह से देखिए तो तिजोरी की चाभी बीजेपी ने धीरे से अपने पास ही रख ली.
भाजपा को पता है कि अजित पवार का गुट एक्टिव रहेगा, पार्टी रहेगी तो शरद पवार की ताकत घटी रहेगी. अगर दोनों गुट एक साथ हुए तो एनसीपी की ताकत भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच सकती है. भाजपा महाराष्ट्र में नंबर एक बनने के बाद ऐसा कतई नहीं चाहेगी.
