
दिल्ली के जनकपुरी में 25 साल के कमल नाम के एक युवा की हादसे में मौत हो गई. सरकारी शब्दावली में 25 साल के नौजवान की मृत्यु दुर्घटना के रूप में दर्ज है. लेकिन ये दुर्घटना का नहीं बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुई मौत का मामला है. घटना बीते गुरुवार की है. अपने ऑफिस से अपने घर कैलाशपुरी जाने के लिए निकला था. रात करीब 11 बजकर 30 मिनट के आसपास उसने घर पर फोन किया. कहा जनकपुरी डिस्ट्रिक सेंटर पर है. घर पहुंचने वाला है. कमल ने जहां से घरवालों को फोन किया, वहां से उसका घर महज 6 किलोमीटर दूर है. घर पहुंचने में उसे बमुश्किल 15 मिनट का समय लगता था. घरवाले इंतजार करते रहे. 15 मिनट, आधे घंटे फिर एक घंटा गुजर गया. रात 12 बजकर 30 मिनट तक कमल घर नहीं पहुंचे तो घरवालों की चिंता बढ़ी. परेशान माता-पिता विकासपुरी थाने पहुंचे.
सिस्टम के लिए कागज का टुकड़ा, अपनी ही बनाई हुई कागजी प्रक्रिया कैसे आम आदमी की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है वो कमल ध्यानी की असमय मौत से फिर साबित हो गया.
कमल का परिवार रात के 12 बजकर 30 मिनट पर विकासपुरी थाने पहुंचा था. घरवाले चाहते थे गुमशुदगी की सूचना दर्ज हो और पुलिस जल्द से जल्द कमल को तलाशने का अभियान शुरू करे. लेकिन फिर वही सिस्टम का नियम भारी पड़ गया. पुलिस ने कहा की गुमशुदगी की रिपोर्ट तो 24 घंटे बाद ही दर्ज होती है. घरवालों ने मोबाइल लोकेशन निकाल कर जानकारी जुटाने का आग्रह किया. पुलिस ने मोबाइल लोकेशन ट्रैक की और एक लोकेशन साझा भी की, लेकिन वह तुरंत डिलीट हो गई. जब दोबारा जानकारी मांगी गई, तो लोकेशन गोपनीय बताते हुए देने से इनकार कर दिया गया. बस इतना बताया गया कि फोन लगभग 200 मीटर के दायरे में एक पार्क के आसपास है. दो पुलिसवाले मौके पर भेजे गए. उन्होंने पार्क की तलाशी की कागजी प्रक्रिया निपटाई और लौट गए.
सवाल ये है कि जब लोकेशन का दायरा स्पष्ट था तो पूरे इलाके में सर्चिंग क्यों नहीं की गई. क्यों पुलिसवालों ने सिर्फ औपचारिकता निभाई, कागजी कार्रवाई पूरी की और लौट गए. जानते हैं ऐसा क्यों हुआ क्योंकि कमल आपकी हमारी तरह आम भारतीय नागरिक था. सोचिए अगर कमल कोई वीआईपी होता, किसी नेता का रिश्तेदार होता, किसी पुलिसवाले का परिजन होता तो क्या होता. तब होता ये कि आसपास के थानों से पुलिस बुलाई जाती. सिस्टम का हर पुर्जा अति सक्रिय हो जाता. 200 मीटर नहीं दो किलोमीटर के दायरे में चप्पे-चप्पे की तलाशी होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि कमल ध्यानी तो एक आम भारतीय परिवार के सदस्य थे. सिस्टम भला उन्हें तलाशने के लिए क्यों बोझ उठाता.
संवेदनाशून्य हो चुके सिस्टम की करनी भुगत रहे कमल के माता पिता का एक-एक शब्द अथाह पीड़ा से भरा है. उनका हर आंसू सिस्टम की लापरवाही पर सवाल उठा रहा है. पीड़ित परिवार की त्रासदी समझिए. 25 साल के कपिल की मौत उस दिन हुई जिस तारीख को उसके मंमी-पापा की शादी की मैरिज एनिवर्सरी थी. सोचिए क्या कोई शब्द, कोई संतावना, कोई मुआवजा इस पीड़ा की पूर्ति कर सकता है या उनका दर्द बयान कर सकता है, नहीं कर सकता.
सिस्टम पर सवाल
लेकिन मशीन बन चुके सिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. रात 12 बजकर 30 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 3 मिनट तक कमल का परिवार विकासपुरी, जनकपुरी, सागरपुर, रोहिणी थाने में चक्कर लगाता रहा. पुलिसवालों से मिन्नत-फरियाद करता रहा कि बच्चे को बचा लो और पुलिस ने क्या किया. किसी ने कहा ये हमारे थाने का मामला नहीं है. किसी ने कमल की फोटो ली. उसे पुलिस के ग्रुप व्हाएसअप पर फॉरवर्ड कर दिया और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.
परिवार के लोग, कमल के दोस्त रात भर उन्हें तलाशते रहे. पुलिस ने जो 200 मीटर का दायरा बताया था वहां चक्कर लगाते रहे. लेकिन उनके पास वो संसाधन नहीं, उपकरण नहीं थे जिससे रात के अंधेरे में कमल को तलाश पाते. सुबह 8 बजकर तीन मिनट पर एक आदमी ने PCR को कॉल कर गड्ढे में बाइक और एक आदमी के गिरे होने की जानकारी दी. पुलिस टीम महज तीन मिनट पर मौके पर पहुंची तब फायर विभाग को बुलाया गया. सुबह 8 बजकर 30 मिनट पर कमल का शव गड्ढे से बाहर निकाला गया. कमल के दोस्त ने गंभीर सवाल उठाए हैं. उसने बताया कि 7 लोग आधी रात से सुबह 7 बजे तक उसे ढूंढ रहे थे, लेकिन वह हमें नहीं मिला. रात 1 बजे, जब हमने गड्ढे को चेक किया, तो वह वहां नहीं था. हम हर समय इसी सड़क पर थे, लेकिन हमें समझ नहीं आ रहा कि चेक करने के बाद वह यहां कैसे आ गया. जब हम सुबह 7 बजे घर वापस गए, तो हमारे दोस्त के फोन से कॉल आया, और पुलिस ने हमें बताया कि वह यहां गड्ढे में है. रात में पुलिस उसका फोन क्यों नहीं ढूंढ पाई? हमें शक है कि उसकी हत्या हुई है, भला उसके साथ क्या हुआ होगा?
साजिश की आशंका?
दोस्त सवाल उठा रहे हैं. ये सवाल कमल की मौत को संदिग्ध बना रहे हैं. पुलिस इसपर जांच करेगी. किसी व्यक्ति ने कमल की हत्या की या नहीं की ये जांच के बाद पता चलेगा. लेकिन सिस्टम ने कमल की हत्या की ये सौ प्रतिशत तय है. कमल की हत्या करनेवाले सिस्टम में सिर्फ पुलिस ही शामिल नहीं है. इसमें दिल्ली जल बोर्ड भी शामिल है.
जो हदसा एक परिवार को जीवन भर का दुख दे गया, जो हादसा एक नौजवान को लील गया उस हादसे के लिए जानलेवा गड्ढा दिल्ली जल बोर्ड ने खोदा था. सरकारी एजेंसी है. जाहिर है इन्हें सरकारी गाइडलाइंस की जानकारी होगी. लेकिन इस सरकारी एजेंसी, इसके अफसरों और ठेकेदार ने क्या किया. कोई नियम नहीं माना.
किसी सावधानी का पालन नहीं किया. बीच सड़क पर मौत का गड्ढा खोद दिया. कमल के हत्यारे सिस्टम के आरोपी नंबर वन यानी दिल्ली जल बोर्ड की जानलेवा लापरवाही वाली चार्जशीट भी देखिए.
दिल्ली जल बोर्ड ने सीवर लाइन डालने के लिए करीब 15 फिट गहरा गड्ढा खोदा था. गुरुवार सुबह 11 बजे यानी हादसे के करीब 13 घंटे पहले गड्ढा खोदा गया था. गड्ढे के आसपास सही तरीके से बैरेकेडिंग नहीं की गई थी. आसपास से जानेवालों को गड्ढा दिखे इसके लिए भी लाइटिंग होनी चाहिए था. लेकिन यहां पर्याप्त लाइटिंग की व्यवस्था भी नहीं थी. नियम के मुताबिक मौके पर गार्ड की तैनाती की जानी चाहिए थी. लेकिन गार्ड भी मौके पर नहीं था.
दिल्ली पुलिस ने कमल की मौत पर FIR दर्ज की है. FIR में लिखा एक-एक शब्द बता रहा है कि कमल की हत्या सिस्टम ने की है. पुलिस ने अपनी FIR में दर्ज किया है कि गड्ढे को ढंका नहीं गया था. मौके पर चेतावनी चिन्ह या रिफ्लेक्टर नहीं लगा था. लाइटिंग का इंतजाम नहीं था. गार्ड भी नहीं था. जल बोर्ड और उसके ठेकेदार ने लापरवाही बरती.
सोचिए ये कितनी बड़ी त्रासदी है. जब कमल के घरवाले अपने बेटे की तलाश करने की फरियाद कर रहे थे तो सिस्टम का एक पुर्जा यानी पुलिस कानूनी प्रक्रिया की दुहाई दे रही थी. लेकिन उसी सिस्टम का दूसरा पुर्जा यानी दिल्ली जल बोर्ड ने एक भी कानून का पालन नहीं किया.
दिल्ली जल बोर्ड दिल्ली के जल मंत्रालय के तहत आता है. इस विभाग के मंत्री हैं प्रवेश वर्मा. शुक्रवार को प्रवेश वर्मा भी उस जगह पहुंचे जहां कमल की जान गई थी. प्रवेश वर्मा लोगों से मिले. लेकिन किसी सवाल का जवाब नहीं दिया. एक शब्द नहीं बोले. औपचारिकता निभाने के लिए ये तक नहीं कहा कि दोषियों पर कार्रवाई होगी. इतना कह सकते थे कि जांच होगी, चीफ इंजीनियर, जूनियर इंजीनियर, एसिस्टेंट इंजीनियर पर कार्रवाई होगी. लेकिन कुछ नहीं बोले, बस चुपचाप चले गए.
जहां कमल की जान गई वो इलाका दिल्ली के मंत्री आशीष सूद के विधानसभा में आता है. सहानुभूति जताने के लिए सूद भी मौके पर पहुंचे. उन्होंने बड़ी शाब्दिक चतुराई से मानो सिस्टम का बचाव करने की कोशिश की. बोले- बैरेकेडिंग थी. सुरक्षा मानकों का ऑडिट हुआ था. तो फिर भला क्या माना जाए ये सिस्टम की लापरवाही नहीं थी.
80 मिनट तक मदद नहीं मिली, 8 घंटे सिस्टम इंतजार करता रहा
अभी कुछ दिन पहले 27 साल के युवराज की जिंदगी को लील गया हादसा आपको याद होगा. वही युवराज जो नोएडा में एक गड्ढ़े में डूब गए थे. 80 मिनट तक वो मदद का इंतजार करते रहे. लेकिन मदद नहीं मिली. 20 दिन बाद 40 किलोमीटर दूर 25 साल के कमल के साथ भी ठीक वैसा ही हुआ. घरवाले फरियाद करते रहे. सिस्टम इंतजार करता रहा. नौजवान की जान चली गई. लेकिन सिस्टम सिर्फ इस बात का इंतजार करता रहा कि FIR दर्ज करने के लिए जरूरी समय पूरा हो. मतलब इसे क्या ही कहेंगे. सोचिए इस सिस्टम को चलाने वाले लोग कैसे हैं.
वो मशीन नहीं है. वो भी हमारी-आपकी तरह मानव हैं. लेकिन उनकी संवेदना आम आदमी के लिए नहीं जगती है. उन्हें आम आदमी की पीड़ा, दर्द, मजबूरी, लाचारी का अहसास ही नहीं होता है. उन्हें आम आदमी दिखता ही नहीं है. इस सिस्टम को कागज दिखता है, वीआईपी दिखता है, पैसा भी दिखता है. बस जिस आदमी की सहूलियत के लिए इसे काम करना है वो आम आदमी ही इसे नहीं दिखता है
जनकपुरी के गड्ढे में कमल की मौत नहीं हुई, सिस्टम की लापरवाही ने उसकी हत्या कर दी. हादसे में सिस्टम गड्ढे में दफ्न हो गया. इसलिए सिस्टम पर वो भी सवाल उठा रहे हैं जो कभी इस सिस्टम का हिस्सा थे. आज सत्ता से बाहर हैं तो अपने राजनीतिक सवालों को संवेदना की चाश्नी में पिरोकर सवाल उठा रहे हैं.
AAP के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने तंज कसते हुए आशीष सूद को लपेटा. कई सवाल पूछे. ये राजनीतिक सवाल पूछे जाते रहेंगे. पता है अब क्या होगा? जांच होगी, रिपोर्ट आएगी. कुछ छोटे दर्जे के कर्मचारियों को दोषी भी ठहरा दिया जाएगा. निलंबन जैसी कार्रवाई भी होगी. हो सकता है ठेकेदार पर जुर्माना भी हो जाए.
पीड़ित परिवार के लिए मुआवजे का ऐलान हो सकता है. दो चार दिन बाद ये हादसा एक फाइल की शक्ल में बदल जाएगा. उसमें पन्ने बढ़ते जाएंगे. परिवार के आंसू नहीं सूखेगे, लेकिन एक दिन सिस्टम की फाइल बंद हो जाएगी. फिर ये फाइल तब खुलेगी जब कोई दूसरा ‘कमल’ सिस्टम की लापरवाही में जान गंवा देगा.
ये पहली बार नहीं हुआ है, और ना आखिरी बार. 17 जनवरी को सिस्टम की लापरवाही से नोएडा में युवराज की जान गई. 6 फरवरी को कमल की जान गई. चंद दिन बाद फिर ऐसी खबर आ सकती है.
गड्ढों से देश में कितनी मौतें?
2023 में देशभर में गड्ढों की वजह से 5 हजार 900 हादसे हुए. यानी हर रोज 16 हादसे गड्ढों की वजह से होते हैं. इन हादसों में 2161 लोगों की जान गई, यानी रोजाना 6 लोगों की जान सिस्टम के खोदे गए गड्ढों ने ली है. ये गड्ढ़े सिर्फ जान नहीं ले रहे हैं देश को आर्थिक नुकसान भी पहुंचा रहे हैं. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सालाना करीब 30 हजार करोड़ का नुकसान गड्ढों की वजह से हो रहा है.
जिसे हम सिस्टम कहते हैं ना उसका सच यही है. ये सिस्टम कदम-कदम पर आम आदमी की परेशानी बढ़ाने के लिए गड्ढा खोदता है. जरूरी है कि सिस्टम जिम्मेदार बनाया जाए. उसे बताया जाए की कानूनी प्रक्रिया नहीं, आम आदमी की जान महत्वपूर्ण है. इसलिए आम जनता के लिए भी सिस्टम को फौरन जाग जाना चाहिए.
