News in Brief

30 Years In Jail In Rs 20 bribe Case: पुलिस का पेशा रौबदार होता है. उस पर कानून व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी होती है. दुर्बल की रक्षा करना पुलिस का दायित्व होता है. हालांकि कुछ पुलिसवाले खाकी पर दाग लगने की परवाह न करके पूरे महकमे की छवि खराब कर देते हैं. तमाम प्रयासों के बावजूद पुलिस की निगेटिव छवि पूरी तरह बदली नहीं है. आज भी कहा जाता है कि ‘पुलिसवालों की न दोस्ती अच्छी, ना दुश्मनी’, लेकिन कभी आपने सोचा है कि किसी पुलिसवाले को उस अपराध की सजा मिली हो, जो उसने किया ही ना हो. संभव है कि ऐसा मामला आपने न देखा हो, लेकिन अब जो कहानी बताने जा रहे हैं वो रील नहीं रियल है, इसलिए आपको भी इमोशनल कर देगी.

बाइज्जत बरी अगले दिन मौत

न्याय में देरी, अन्याय है (Justice delayed is justice denied). जो हुआ खुद एक पुलिसवाले के साथ. बात गुजरात पुलिस के कॉन्स्टेबल बाबूभाई की जो आज दुनिया में नहीं है. अहमदाबाद में तैनात बाबूभाई प्रजापति के करियर में कभी ऐसा काला दिन आएगा जो उनकी जिंदगी बर्बाद कर देगा, ये उन्होंने सोचा भी नहीं होगा. एक दिन 20 रुपये की घूस लेने का आरोप लगता है, जिसके लिए उन्हें 30 साल जेल में बिताने पड़े. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से हाईकोर्ट तक कानूनी लड़ाई खिचती है. HC ने उन्हें बेगुनाह करार दिया. ये वाकया 1994 में आई हॉलीवुड फिल्म की याद दिला गया जिसमें एक बेगुनाह आदमी ने जिंदगी का लंबा समय जेल में बिताया था.

गुजरात हाई कोर्ट ने इसी साल 4 फरवरी को अपने फैसले में उन्हे बाइज्जत रिहा किया तो उन्होंने अपने वकील से कहा, ‘मेरी जिंदगी से यह कलंक मिट गया है. अब भगवान भी मुझे बुला लें, तो मुझे कोई दुख नहीं होगा.’ क्या पता कि जब उन्होंने ये बात कही उस वक्त उनकी जुबान में सरस्वती बैठी थी.

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1996 में क्या हुआ था?

बाबूभाई पर घूस लेने के आरोप प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत लगे थे. 1997 में सेशन कोर्ट में उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई थी. 2002 में चार्ज फ्रेम किए गए. 2003 से गवाहों की सुनवाई शुरू हुई. 2004 में सेशन कोर्ट ने प्रजापति को 4 साल जेल और 3 हजार के जुर्माने की सजा सुनाई. प्रजापति ने सेशन कोर्ट के फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चैलेंज किया. उनकी अपील 22 साल तक पेंडिंग रही. तीन दिन पहले चार फरवरी को फैसला आया कि वो बेगुनाह हैं. 

कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में गंभीर अंतर थे और प्रॉसिक्यूशन आरोप साबित करने में फेल रहा. प्रजापति का केस लड़ने वाले वकील नितिन गांधी ने हाई कोर्ट को बताया कि पूरा केस शक पर आधारित था. वकील ने कहा, चलिए अब आपको सर्विस पीरियड के दौरान की सैलरी और भत्ते दिलाने की प्रक्रिया शुरू करते हैं. वो खुशी-खुशी घर जाते हैं और उनकी नेचुरल डेथ हो जाती है.