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Sudama Pandey (Dhumil): 10 फरवरी की तारीख अपने आप में बेहद खास है. ये अहम दिन हिंदी कविता के एक सशक्त और असाधारण आवाज को याद करने वाला है. 1975 में इस दिन वह आवाज शांत हो गई, जो हिंदी कविता के तेवर, भाषा और  दृष्टि के अलग सलीके से पेश होती थी. हम बात कर रहे हैं सुदामा पांडेय (धूमिल) की, जिनका कम उम्र में ही ब्रेन ट्यूमर के कारण ही निधन हो गया था. हालांकि, उनकी कविताएं आज भी जीवित हैं और लोगों को मार्ग दिखाने का काम करती है. 

दरअसल, साठोत्तरी कविता में धूमिल का उदय एक महत्त्वपूर्ण घटना की तरह माना जाता है. हिंदी की नई कविता और अकविता के संक्रमण काल में धूमिल एक महत्वपूर्ण कवि बनकर उभरे थे. वह ऐसे कवि थे, जिन्हें माना जाता था कि कोई असली मजदूर-किसान कविता के मैदान में उतर आया हो. धूमिल की कविताएं आज भी व्यवस्था, राजनीति और सामाजिक संरचना से सीधे टकराती हैं. हालांकि, वह यह अक्सर कहा करते थे कि शब्द और शस्त्र के व्यवहार का व्याकरण अलग-अलग है. शब्द अपने वर्ग-मित्रों में कारगर होते हैं और शस्त्र अपने वर्ग शत्रु पर होती है. 

केवल क्षणिक नहीं था धूमिल का आक्रोश

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धूमिल का आक्रोश केवल क्षणिक नहीं था. वह एक पूरी पीढ़ी, वर्ग और समय का क्रोध रहा है. इस आक्रोश के केंद्र में शोषण से मुक्ति की तीव्र आकांक्षा देखने को मिली है. उनकी एक कविता में लिखा गया कि एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है, एक तीसरा आदमी भी है, जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है, वह सिर्फ रोटी से खेलता है. मैं पूछता हूं यह तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है.

अपना उपनाम क्यों रखा धूमिल 

बताया जाता है कि सुदामा पांडेय ने खुद अपना उमनाम ‘धूमिल’ रखा था.  उनका जन्म 9 नवंबर 1936 को वाराणसी के एक गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था. परिवार की आजीविका एक छोटी सी दुकान और खेती पर ही निर्भर रही थी. महज 13 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी. युवावस्था में पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई. इसके बाद उन्होंने कलकत्ता में एक लोहा फैक्ट्री में मजदूरी का काम किया. बाद में आईटीआई से इलेक्ट्रिक डिप्लोमा लेकर अनुदेशक के रूप में कार्य किया. 

धूमिल की कविताओं में दिखता है तीखा असंतोष

धूमिल की कविताओं में तीखा असंतोष दिखता है. वह समय के सामाजिक-राजनीतिक माहौल और नक्सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित निम्नमध्यमवर्गीय चेतना का भी परिणाम था. बताया जाता है कि धूमिल की सबसे बड़ी ताकत उनकी काव्य-भाषा है. अपनी कविताओं में उन्होंने आमफहम शब्दों का भरपूर इस्तेमाल किया. उनके कविताओं की भाषा बेहद आम और सामान्य रही है. उनकी ये कविताएं पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती रही हैं. उनकी कविताएं उन नैतिकताओं और भद्रताओं को चुनौती देती हैं, जिनका उपयोग सत्ता अपनी रक्षा के लिए करती है.

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जीवन काल में केवल एक काव्य संग्रह हुआ प्रकाशित 

यह भी एक संयोग ही है कि धूमिल के जीवनकाल में उनका केवल एक काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ (1972) प्रकाशित हो पाया. हालांकि, उनके निधन के बाद ‘कल सुनना मुझे’ (1977) और ‘सुदामा पांडे का प्रजातंत्र’ (1984) भी प्रकाशित हुए. केवल कविता ही नहीं उन्होंने गद्य पर भी काम किया. एक दर्जन से अधिक निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए.

साहित्य पुरस्कार से सम्मान 

उल्लेखनीय है कि उनके निधन के बाद प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ के लिए उन्हें वर्ष 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. धूमिल हिंदी कविता में उस आवाज का नाम है, जिसने कविता को बौद्धिक विमर्श से निकालकर जीवन के कठोर यथार्थ से जोड़ा. (इनपुट- आईएएनएस)

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