DNA Analysis: कानून के सामने सभी बराबर हैं. ये संविधान की मूल भावना है. लेकिन सिस्टम इस मूल भावना की व्याख्या भी अपनी सुविधा के मुताबिक करता है. भारतीय संविधान लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना करता है और उसे आदर्श मानता है. लोककल्याणकारी शासन यानी देश के हर नागरिक के कल्याण के लिए काम करनेवाला शासन. संविधान निर्माताओं ने पूरे शासन की कल्पना इसी बुनियाद पर की थी. अब हम विश्लेषण करेंगे उस राजनीतिक चतुराई की जो जनकल्याण के नाम पर संविधान और उसकी मूल भावना की अनदेखी करती है. जो राष्ट्रहित में खर्च होनेवाला धन एक खास नजरिए से खर्च करती है.
कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने एक योजना को मंजूरी दी है. योजना है 2013-2014 से लेकर 2018-19 तक के कर्ज पर ब्याज की माफी का. कर्नाटक सरकार इसके लिए एकमुश्त निपटान योजना लाई है, इसके तहत मूल कर्ज की रकम देने पर ब्याज माफ हो जाएगा, सरकार का मकसद फंसे हुए लोन की वसूली है. सरकार को उम्मीद है कि इससे 718 करोड़ की वसूली होगी. ब्याज के साथ पूरा लोन 981 करोड़ रुपए का होता है.
कर्नाटक सरकार की योजना के नियम जानिए
एक नज़र में देखने पर कर्नाटक सरकार का उद्देश्य अच्छा लगता है. सरकार के फंसे हुए पैसों की वसूली हो ये कर्नाटक के लिए अच्छी पहल है. लेकिन इस पूरी योजना में एक शर्त है. ये वन टाइम सेटलमेंट स्कीम सिर्फ कर्नाटक के अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों के लिए है. कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम और दूसरी एजेंसियों के जरिए कर्नाटक सरकार प्रदेश के मुसलमानों को कर्ज देती है. अब ऐसे मुसलमान जिन्होंने 2013-2014 से लेकर 2018-19 तक कर्नाटक सरकार की एजेंसियों से कर्ज लिया हो वो बिना ब्याज के मूल रकम वापस कर योजना का फायदा उठा सकते हैं.
सिद्धारमैया सरकार की स्कीम पर उठे सवाल
आचार्य चाणक्य ने कहा है कि शासन का धर्म है सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और न्याय देना, जो शासन किसी वर्ग या समूह का पक्ष लेता है या भेदभाव करता है, वह अन्यायी माना जाता है. ये सही है कि सिद्दारमैया सरकार नागरिकों को राहत देने के लिए ब्याजमाफी की स्कीम लाई. लेकिन सवाल ये है कि क्या इस ब्याज माफी का आधार धार्मिक होना चाहिए. क्या न्याय ये नहीं होता कि इसका आधार आर्थिक होता. ये रुपए पैसे से जुड़ा मामला है.
अगर सिद्धारमैया सरकार सचमुच लोककल्याण की भावना से काम करना चाहती तो ब्याज माफी का आर्थिक आधार होता. मित्रो कर्नाटक में कर्ज से जुड़ा एक आंकड़ा समझते हैं. कर्नाटक में ग्रामीण इलाकों में 100 में से 35 लोगों ने कर्ज लिया है. यानी ग्रामीण इलाकों में रहनेवाला राज्य का हर तीसरा नागरिक कर्जदार है. शहरी इलाकों में रहनेवाले 100 में से 23 लोग कर्जदार हैं. कर्नाटक में कर्ज लेनेवाले करीब 10 प्रतिशत लोग लोन डिफॉल्ट करते हैं. यानी कर्ज वापस नहीं कर पाते हैं.
कर्ज के जंजाल में फंसी एक तिहाई आबादी
समझिए जिस राज्य में एक तिहाई आबादी कर्ज के जंजाल में फंसी है. आर्थिक तौर पर परेशान है. वहां कितना अच्छा रहता की ब्याज माफी का आधार ऐसा होता जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ पहुंचाता. लेकिन नहीं सिद्धारमैया सरकार ने धर्म के आधार पर ब्याज माफ करने की स्कीम का ऐलान किया. इसलिए इस फैसले पर सवाल भी उठ रहे हैं. अंबेडकर विकास निगम, वाल्मीकि निगम और अन्य पिछड़ा वर्ग निगमों के लाभार्थियों को ऐसी ही राहत क्यों नहीं दी गई? क्या सिर्फ एक समुदाय को खुश करना ही आपका धर्मनिरपेक्षता का विचार है?
प्रसिद्ध अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा है कि राज्य द्वारा किसी समूह के साथ भेदभाव पूरे समाज को खतरे में डालता है.कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार एक समूह के लिए पूरे समाज से भेदभाव कर रही है. ये भेदभाव सिर्फ सामाजिक मनभेद की दीवार नहीं खड़ी कर रहा है. आर्थिक आधार पर भी पूरे समाज को चोट पहुंचा रहा है. इसे ऐसे समझिए कि कर्नाटक सरकार अपनी कुल आदमनी से 91 हजार करोड़ रुपए ज्यादा खर्च करती है यानी कर्नाटक सरकार को सालभर खर्च चलाने के लिए कर्ज लेना होता है, और ये कर्ज ब्याज मुक्त नहीं है.
सिद्धारमैया सरकार की आमदनी और खर्च
सिद्दारमैया की सरकार अगर 100 रुपए कमाती है तो उसमें से 16 रुपए कर्ज और ब्याज चुकाने पर खर्च करती है, कर्नाटक सरकार करीब 30 रुपया अपने कर्मचारियों की सैलरी पर खर्च करती है. 12 रुपए पेंशन पर खर्च करती है. यानी कुल मिलाकर 100 में से 58 रुपए कर्नाटक सरकार कर्ज अदायगी, सैलरी, पेंशन पर खर्च कर देती है. ऐसे में 100 रुपए में से सिर्फ 42 रुपए ही विकास के काम के लिए बचते हैं.
सोचिए ऐसा राज्य जहां टैक्सपेयर का आधे से ज्यादा पैसा विकास में नहीं कर्ज और सैलरी में खर्च होता है उस राज्य में सरकारी कोष में जमा होनेवाले एक-एक रुपए की अहमियत कितनी होगी. इसलिए सिद्धारमैया सरकार का ये फैसला पूरे समाज को चोट पहुंचानेवाला है. जानते हैं ऐसा क्यों हैं. सरकार की आमदनी का बड़ा हिस्सा आपके-हमारे तरह के टैक्स पेयर्स की जेब से आता है. न्यायपूर्ण ये होता कि ये पैसा विकास के उन कार्यो में खर्च होता जो सबके लिए होते हैं. अच्छी सड़कें बनती, पुल बनते, किसानों के खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचाया जाता. अच्छे सरकारी स्कूल बनते, अच्छे सरकारी अस्पताल बनते. संक्षेप में कहें तो ऐसी सुविधाएं जुटाई जाती जो समाज के बड़े तबके और हर तबके के लिए जरूरी होती. लेकिन हो क्या रहा है.
करदाताओं के पैसों का क्या हो रहा है?
करदाताओं की मेहनत की कमाई के पैसे से समाज के एक छोटे से वर्ग को राहत दी जा रही है. इसके पीछे कैसी सोच काम कर रही होगी उसपर आज हम चर्चा नहीं करेंगे. आप सब जानते हैं कि नेता ऐसी संर्कीण सोच वाले फैसले क्यों लेते हैं. ऐसी योजनाओं का नुकसान आपको-हमको यानी आम आदमी को कितना होता है उसे समझते हैं. कर्नाटक सरकार ने शिक्षा का बजट 2 प्रतिशत घटा दिया. क्योंकि राज्य सरकार के पास फंड नहीं था.
धन की कमी से अटके कई बड़े प्रोजेक्ट
फंड की कमी के कारण स्वास्थ्य का बजट भी नहीं बढ़ा. यानी नए अस्पताल और इलाज की सुविधाए में कटौती की गई. सोचिए ये कितना गंभीर संकट है. धन की कमी के कारण अपर कृष्णा प्रोजेक्ट का काम अटका हुआ है. इस प्रोजेक्ट से राज्य के 12 लाख एकड़ जमीन की सिंचाई होगी. 5 लाख से ज्यादा किसान परिवारों को लाभ मिलेगा. अपर भद्रा प्रोजेक्ट भी पैसों की कमी से अटका हुआ है. बेंगलुरू देश का IT हब है. लेकिन वहां ट्रैफिक व्यवस्था बदहाल है. बेंगलुरू में टनल रोड्स, मेट्रो के प्रोजेक्ट्स पैसों की कमी से अटके हुए हैं.
तर्क और न्याय के आधार पर होने चाहिए सरकार के फैसले
बूंद-बूंद से घड़ा भरता है. एक-एक रुपए से सरकार का खजाना भरता है. हमने आपको जिन प्रोजेक्ट की जानकारी दी वो कर्नाटक के विकास के लिए, कर्नाटक के आम नागरिकों की समृद्धि के लिए बहुत जरूरी हैं. अगर सिद्धारमैया सरकार आर्थिक अनुशासन का पालन करती तो जरूर ये प्रोजेक्ट समय पर पूरे होते. राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट घटाना नहीं पड़ता. कर्नाटक में आम आदमी तक सुविधाएं इसलिए नहीं पहुंच रही हैं क्योंकि राज्य सरकार के फैसलों का आधार तर्कसंगत नहीं है. इसलिए ये फैसले पूरे समाज को चोट पहुंचा रहे हैं. बेशक सरकार को आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों को राहत पहुंचानी चाहिए. लेकिन ये फैसले तर्क और न्याय के आधार पर होने चाहिए. कर्नाटक सरकार को समझना चाहिए की उसके कोष में जो धन है वो करदाताओं ने दिया है. उसे सोच समझ कर सबके हित में खर्च करना चाहिए.
क्या देश की लोकतांत्रित व्यवस्था में समानता का भाव पीछे छूट गया?
अपने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये समानता का भाव शायद पीछे छूट गया है. इस वक्त मेरी बाईं तरफ इसी असमानता का साक्ष्य देख रहे हैं. पहले आपको BIG WALL पर एक कैलेंडर दिखाते हैं. देखिए ये इस्लामिक कैलेंडर है. कैलेंडर में हिजरी परंपरा के मुताबिक तारीख और धार्मिक त्योहार दर्ज हैं. इसपर कैलेंडर छापनेवाले का नाम लिखा है मनोज शुक्ला. बकायदा विधानसभा क्षेत्र भी लिखा है. कैलेंडर में रमजान का वक्त दर्ज है. अच्छी बात है. धार्मिक विश्वास के मुताबिक कैलेंडर छपवाने और बांटने में कोई बुराई नहीं है. बुराई तब है जब धार्मिक विश्वास के बहाने राजनीतिक हित साधने की कोशिश होती है.
मस्जिद के बाहर इस्लामिक कैलेंडर बांटते मनोज शुक्ला कांग्रेस के नेता हैं. भोपाल की नरेला सीट से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. इस क्षेत्र में करीब 28 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. फिर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. इसलिए उन्होंने इस्लामिक कैलेंडर छपवाया और मस्जिद के बाहर स्वंय इसे बांटने पहुंच गए. समाज के एक वर्ग को विशिष्ट महसूस कराने और चटपट फायदा उठाने वाले इस रानजीतिक फॉर्मूले का असर भी तत्काल दिखने लगा. इस्लामिक कैलेंडर छपवाना ना तो कानूनी तौर पर गलत है और ना ही अनैतिक है. अगर किसी धार्मिक संस्था ने ये कैलेंडर छपवाया होता तो शायद ही इस पर कोई सवाल उठता. लेकिन कैलेंडर नेताजी ने छपवाया है.
भोपाल में मनोज शुक्ला का प्रयोग
सोचिए ऐसे नेता अगर जनप्रतिनिधि बन जाएं यानी चुनाव जीत जाएं तो क्या करेंगे. जब उनकी राजनीतिक सोच ही भेदभाव और अन्याय की बुनियाद पर खड़ी है तो क्या वो जनप्रतिनिधि होने के नाते अपने क्षेत्र के सभी निवासियों से न्याय कर पाएंगे. क्या जनप्रतिनिधि होने का दायित्व वो पूर्ण ईमानदारी से निभा पाएंगे. शायद नहीं. इसलिए नरेला विधानसभा क्षेत्र के लोग मनोज शुक्ला पर सवाल भी उठा रहे हैं. प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक प्लटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में लिखा है कि आदर्श शासक ज्ञान, सत्य और न्याय का प्रेमी होना चाहिए.
मनोज शुक्ला जी भी अगर चुनाव जीत गए तो शासक बनेंगे. क्या वो आदर्श शासक बन सकते हैं. शायद नहीं. क्योंकि वो न्याय नहीं पक्षपात के प्रेमी हैं. हम इसे तुष्टीकरण नहीं कहेंगे. ये तुष्टीकरण से बड़ी और खतरनाक बीमारी है. ऐसी सोच सामान्य नागरिकों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करती है. समाज के एक वर्ग को विशिष्ट तो दूसरे के उपेक्षित महसूस कराती है. ऐसी सोच ही सामाजिक बंटवारे के बीज बोती है. जरूरी है कि ऐसी सोच वालों को बताया जाए की उनमें जनप्रतिनिधि बनने की योग्यता नहीं है. वो नैतिक तौर पर जनप्रतिनिधि बनने के योग्य नहीं है. अगर वो सच्चे जनप्रतिनिधि बनना चाहते हैं तो ये पक्षपात वाला नजरिया छोड़ना होगा. सर्वजन हिताय वाली सोच को अपनाना होगा
भोपाल में मनोज शुक्ला जो प्रयोग कर रहे हैं भोपाल से 510 किलोमीटर दूर उस प्रयोग का परिणाम सामने आ गया है. ये राजनीतिक परिणाम ऐसा है कि इसने बुर्के वाली प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान करनेवाले ओवैसी को भी डरा दिया है. मालेगांव में इस्लाम पार्टी की शेख नसरीन खालिद मेयर बनी हैं. समाजवादी पार्टी की शान-ए-हिंद निहाल अहमद को डिप्टी मेयर चुना गया. यहां कांग्रेस ने इस्लाम पार्टी और समाजवादी पार्टी के मालेगांव सेक्युलर फ्रंट का समर्थन किया था
देखा आपने नसरीन उड़ती हुई पतंग को काट रही हैं. आपको जश्न मनाने का ये एक्शन शायद अटपटा लगा होगा. लेकिन ये अटपटा नहीं है. पतंग काटने वाले इस जश्न में एक राजनीतिक संदेश है. इसे समझने के लिए एक दूसरा वीडियो देखना होगा. महाराष्ट्र में कई चुनावी रैलियों में ओवैसी साहब ने पंतग उड़ाने वाला स्टंट किया था. ओवैसी साहब का सियासी संदेश यही था कि अब उनकी पार्टी महाराष्ट्र के राजनीतिक आसमान मेँ छा जाएगी. अब पूरा संदेश आपको समझ आ रहा होगा. ओवैसी साहब की पतंग को इस्लाम पार्टी की नसरीन खालिद ने काट दी. समाज के एक वर्ग को विशिष्ट बताकर उसका एकमुश्त वोट लेने की जो राजनीति असदुद्दीन ओवैसी ने शुरू की थी, उसी राजनीति में इस्लाम पार्टी ने ओवैसी को हरा दिया
ओवैसी को उम्मीद थी कि कट्टरपंथ के मांझे में बंधी उनकी पतंग मालेगांव में आसमान की ऊंचाईयों को छूएगी. लेकिन इस्लाम पार्टी के कट्टरपंथ का रसायन ओवैसी से ज्यादा असरदार साबित हुआ. इसलिए मालेगांव में बुर्के वाली मेयर जरूरी बनी लेकिन वो ओवैसी की पार्टी की नहीं इस्लाम पार्टी की सदस्य है. ओवैसी का डर यही है. मालेगांव में इस्लाम पार्टी का जो प्रयोग हुआ है अगर उसका विस्तार हुआ तो इसकी कीमत ओवैसी को चुकानी होगी. क्योंकि समाज के जिस वर्ग को ओवैसी विशिष्ट बताकर उसका वोट लेते हैं, उसी वोट पर इस्लाम पार्टी की भी दावेदारी है. मालेगांव के प्रयोग ने बता दिया है कि जहां सीधी टक्कर होगी वहां इस्लाम पार्टी जैसी सोच और संगठन ओवैसी पर भारी पड़ेंगे. मित्रो अच्छा तो ये होता की ऐसी राजनीति खत्म होगी, लेकिन चिंता की बात ये है कि इसका विस्तार हो रहा है.
