
A R Rahman statement: मजहबी अवसरवाद के साथ-साथ धार्मिक आधार पर पीड़ित बनने का खेल भी लंबे समय से चल रहा है. इस खेल से बॉलीवुड भी नहीं बचा. बड़े-बड़े कलाकार भी इस खेल में समय-समय पर मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं. इस बार मुख्य भूमिका में ए आर रहमान हैं. जिनका दोषारोपण कुछ इस तरह का ही है. संगीतकार ए आर रहमान ने एक इंटरव्यू में कहा है कि उन्हें पिछले 8 साल से बॉलीवुड में काम मिलना कम हो गया है. रहमान ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम न मिलने की वजह सांप्रदायिकता और बदलते पावर शिफ्ट को बताया है.
जहां 3 सुपरस्टार ‘खान’ हैं वो कम्युनल कैसे?
ऐसा ही दोषारोपण बॉलीवुड के सबसे बड़े संगीतकारों में से एक अल्लाह रक्खा रहमान उर्फ ए आर रहमान ने शुरू कर दिया है. लेकिन सवाल ये है कि जहां 3 सुपरस्टार ‘खान’ हैं वो कम्युनल कैसे हो गया? आखिर 30 साल बाद उन्हें बॉलीवुड सांप्रदायिक क्यों लग रहा? जो बॉलीवुड उन्हें रामायण जैसी फिल्म में काम देता है वो भेदभाव करने वाला कैसे हो गया?
तीन दशक से ज्यादा बॉलीवुड में बिताने के बाद, बॉलीवुड से हॉलीवुड तक का सफर तय करने के बाद अब रहमान को बॉलीवुड में खोट दिखाई देने लगा है. नए साल में उन्हें ये नया दिव्यज्ञान मिला कि बॉलीवुड सांप्रदायिक हो गया है और वो भी सुनी-सुनाई बातों पर. बॉलीवुड से ए आर रहमान की इस कृतघ्नता की वैचारिक मरम्मत जरूरी है क्योंकि वो बॉलीवुड के नाम पर देश को भी बदनाम कर रहे हैं.
रहमान ऐसी फिल्म इंडस्ट्री को कम्यूनल बता रहे हैं जहां ‘खान’ सरनेम होना फिल्म हिट होने की गारंटी माना जाता है. जहां सबसे बड़े सुपर स्टार सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान हैं. सोचिए, जो बॉलीवुड मुस्लिम कलाकारों को हाथों-हाथ लेता है, उसे रहमान सांप्रदायिकता के रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं.
एक आम आदमी भी जानता है कि सफलता हमेशा नहीं रहती. प्रासंगिक बने रहने के लिए ख़ुद को लगातार बदलना पड़ता है. अगर रहमान की ये बात मान भी ली जाए कि अब उन्हें बॉलीवुड में काम नहीं मिल रहा है, तो इसका ये अर्थ है कि रहमान खुद को बदलने में नाकाम रहे हैं.
हर कलाकार के जीवन में ऐसा मोड़ आता है जब असफलता उसके सामने सामने होती है. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी इससे नहीं बच पाए थे. लेकिन इसके लिए बॉलीवुड को बदनाम करना, थाली में छेद करने के समान है.
ए आर रहमान भूल जाते हैं कि ज्यादा समय नहीं बीते जब लोगों ने, फिल्म इंडस्ट्री ने उनके संगीत को सेलिब्रेट किया था, उन्हें एक आइकॉनिक स्टेटस तक पहुंचाया था. अब उन्हीं लोगों को दोष देना एहसान फरामोशी जैसा लगता है. आज उन्हें अपने दिव्य ज्ञान पर कुछ बॉलीवुड कलाकारों को भी सुनना चाहिए.
#DNAमित्रों | जिसने ‘रामायण’ में काम दिया, वो ‘सांप्रदायिक’ हो गया?..ए आर रहमान का बयान..’कुंठा क्लब’ को सूट करता है!#DNA #DNAWithRahulSinha #ARRahman #Bollywood @RahulSinhaTV pic.twitter.com/BOjxnO5YEj
— Zee News (@ZeeNews) January 17, 2026
सुना आपने, जावेद अख्तर क्या कह रहे हैं. ए आर रहमान ने खुद को इतना व्यस्त कर लिया है कि बॉलीवुड के निर्माता उनके पास जाने से कतराते हैं. छोटे बजट की फिल्म के निर्माता उनके पास जाने से हिचकते हैं क्योंकि उनकी फीस बहुत ज़्यादा है. सोचिए, कारण कुछ और है लेकिन रहमान नया बहाना ढूंढ़ कर ले आए.
आज हम आपको कुछ और संभावित कारण बता रहे हैं, जिसकी वजह से बॉलीवुड में रहमान की उतनी पूछ नहीं रही. 90 के दशक से लेकर साल 2000 के आसपास तक रहमान ने कई सुपरहिट फिल्में दीं. रोजा, दिल से, ताल, लगान और रंग दे बसंती जैसी कई फिल्में हैं. उनके उस दौर के गाने अब भी लोगों की जुबान पर हैं. लेकिन हाल के वर्षों में उनकी जो फिल्में आई हैं, उनके गाने उतने लोकप्रिय नहीं रहे. 2025 की फिल्म छावा बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट रही. लेकिन इस फिल्म के म्यूजिक को सबसे कमजोर पहलू माना गया.
पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड में कई नए म्यूजिक डायरेक्टर आए हैं जिनका संगीत आज के दौर के हिसाब से है. इनमें कई मुस्लिम संगीतकार भी हैं. इन संगीतकारों ने लोगों की पसंद को पहचाना, उनके हिसाब से खुद को बदला लेकिन शायद रहमान का स्टाइल नहीं बदला. ऐसे में अगर काम नहीं मिलता है तो कम्यूनल एंगल तलाशने के बदले उन्हें ख़ुद को बदलने पर ध्यान देना चाहिए. वो भूल जाते हैं कि उनका गोल्डन पीरियड 90 के दशक के अंत से लेकर 2000 के आस-पास के साल तक था. उस वक़्त भी देश में BJP की ही सरकार थी.
विडंबना देखिए, जो ए आर रहमान बॉलीवुड में सांप्रदायिकता की बात कर रहे हैं, वही रहमान हिंदुओं के धर्मग्रंथ रामायण पर आधारित फिल्म में संगीत भी दे रहे हैं. रहमान साहब, अगर बॉलीवुड में सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव होता तो आपको रामायण फिल्म का संगीत देने के लिए नहीं चुना जाता. लेकिन अपने बयान से रहमान ने देश के नेताओं को एक नया मुद्दा थमा दिया है.
रहमान की कथित पीड़ा को लेकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां जितनी भी आवाज़ उठाएं लेकिन रहमान जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें ये मुद्दा उनके हाथ से निकल चुका है. इस तरह के मुद्दों का पेटेंट अब ओवैसी की AIMIM या इस्लाम पार्टी ने करा लिया है. खुद को सेक्यूलर पार्टी कहने वालों को रहमान से सहानुभूति का फायदा अब शायद नहीं होने वाला है. हमारे देश में जो कुंठा क्लब है, उसे रहमान का सुनियोजित बयान सूट करता है. इसलिए वो रहमान का बयान सुने और देखे बिना भी उनके लिए बैटिंग करता है. लेकिन कोई राष्ट्रवादी कलाकार अगर अपना दर्द बयां करे तो उसे ये लोग घेर लेते हैं.
खुद को बेरोजगार बताने वाले ए आर रहमान की कमाई के बारे में भी आज आपको जानना चाहिए. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बतौर म्यूजिक डायरेक्टर वो एक फिल्म की फीस 8-12 करोड़ लेते हैं. लाइव कॉन्सर्ट या परफॉर्मेंस के लिए 1 करोड़ से 2 करोड़ की फीस लेते हैं. इनकी वार्षिक कमाई 100 करोड़ रुपये से लेकर 150 करोड़ रुपये तक है. 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में 100 करोड़ से ज्यादा कमाने वाले गिने-चुने ही हैं. इस सूची में ए आर रहमान की गिनती भी होती है, इसके बावजूद उनका ऐसा बयान देना समझ से परे है.
