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DNA Analysis: मुस्लिम मतदाता सिर्फ उस दल के साथ जाएंगे जिसके नाम में इस्लाम होगा. जिसकी कमान किसी मुस्लिम नेता के हाथ में होगी. आज हम इसी ‘मालेगांव मॉडल’ को डिकोड करने वाले हैं. आज आपको पता चलेगा, आखिर क्यों मालेगांव मॉडल को देश के लिए रेड अलार्म कहा जा रहा है? इसने सेक्युलर दलों के लिए कैसे खतरे की घंटी बजा दी है? लेकिन विश्लेषण को आगे बढ़ाने से पहले हम आपको मालेगांव के बारे में कुछ बुनियादी जानकारी देना चाहेंगे. मालेगांव महाराष्ट्र के उत्तरी हिस्से में खानदेश क्षेत्र के पास नासिक जिले का एक शहर है. ये नासिक से 110 किलोमीटर दूर और मुंबई से 280 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है.

2011 की जनगणना के मुताबिक मालेगांव में करीब 80 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है और 20 प्रतिशत हिंदू. कल महाराष्ट्र में मुंबई के साथ-साथ मालेगांव महानगरपालिका के भी नतीजे आए. मालेगांव नगर निगम में 84 सीटे हैं. इनमें से सबसे ज्यादा 35 सीटें इस्लाम पार्टी ने जीती है. इस ‘इस्लाम पार्टी’ का नाम आप ध्यान में रखिएगा. क्योंकि आज मालेगांव मॉडल के साथ इसका भी बार-बार जिक्र होने वाला है. इस्लाम पार्टी के बाद जिसे सबसे ज्यादा सीटें मिलीं वो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM है. जिसे 21 सीटे मिलीं. इसके अलावा शिवसेना शिंदे गुट को 18, समाजवादी पार्टी को 5, कांग्रेस को 3 और बीजेपी को सिर्फ 2 सीटें मिलीं.

मालेगांव मॉडल
यानी मालेगांव में 70 प्रतिशत सीट सिर्फ 2 पार्टियों को मिलीं. वे दोनों पार्टियां कौन हैं? ये वो हैं जिनके नाम और पहचान सीधे-सीधे इस्लाम और मुसलमान से जुड़े हैं. बाकी सारी पार्टियां, जिसमें समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी कथित सेक्युलर पार्टी भी है वो हाशिये पर चली गईं. कांग्रेस और एनसीपी का तो यहां पर मेयर भी रहा है. लेकिन कांग्रेस को 3 सीटें मिली और एनसीपी को तो वो भी नहीं मिल पाईं. कुल मिलाकर मालेगांव के चुनावी नतीजों का निचोड़ ये है कि मालेगांव में नए स्तर पर साम्प्रदायिक गोलबंदी हुई. लोकल पार्टी का उदय हुआ और सेक्युलर पार्टियों की विदाई हो गई. इसी के बाद ‘मालेगांव मॉडल’ की चर्चा होने लगी. 

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मजहबी राजनीति
पॉलिटिकल पंडित इसे अलार्म के तौर पर देख रहे हैं. कहा जा रहा है कि मुसलमानों ने अब सोच लिया है कि सेक्युलर दलों की बजाय अब वे उन्हीं को वोट देंगे जो मुसलमानों की पार्टी है. मालेगांव से ये एक बड़ा संदेश गया है. जैसा कि हमने आपको बताया कि मालेगांव में सबसे ज्यादा सीट इस्लाम पार्टी को मिली है. ये जो इस्लाम पार्टी है, ये एक लंबे-चौड़े नाम का शॉर्ट फॉर्म है. ‘इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट एसेम्बली ऑफ महाराष्ट्र’, इतना लंबा अंग्रेजी नाम है,जिसका सीधा हिंदी अर्थ बताने के लिए शायद पार्टी के नेताओं को भी डिक्शनरी देखनी पड़े. लेकिन ये नाम कोई संयोग नहीं है. ये शत प्रतिशत मजहबी राजनीति का कट्टर प्रयोग है. इस पार्टी के इतना लंबा नाम रखने का उद्देश्य भी सिर्फ यही है कि इसका शॉर्ट फॉर्म ‘इस्लाम’ हो और ये सीधे अपने लक्षित वोटर को संदेश दे. इसलिए आप इस पार्टी के नाम को बौद्धिक पाखंड की श्रेणी में भी रख सकते हैं.

इस्लाम पार्टी
ये जो स्वयंभू सेक्युलर ‘इस्लाम पार्टी’ है इसके मुखिया शेख आसिफ हैं. आसिफ शेख साहब मालेगांव में मंझे हुए नेताओं में से एक हैं. कांग्रेस का हाथ थामकर विधायक रहे, हार गए तो फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस की घड़ी पहन ली, कुछ दिनों तक राष्ट्रवादी कांग्रेस में रहे. पूर्व विधायक शेख आसिफ साहब को सियासत विरासत में मिली है. उनके पिता शेख रशीद भी विधायक रहे हैं. माता-पिता दोनों मालेगांव के मेयर भी रहे हैं. इसलिए उन्हें राजनीति की अच्छी जानकारी है. इसी जानकारी के आधार पर शेख आसिफ ने शोध करके ऐसी पार्टी बनाई जिसका शॉर्ट फॉर्म इस्लाम पार्टी है. इस पार्टी के नामकरण का कुछ इस्लामिक विद्वानों ने विरोध किया था. पार्टी का नाम बदलने की मांग की थी. लेकिन शेख आसिफ ने पार्टी का नाम नहीं बदला.

मजहब के नाम पर पार्टी 
शेख आसिफ का मकसद क्लियर है. उन्हें इसका रास्ता भी पता है, इसलिए उन्होंने उन्हीं मुद्दों को पकड़ा, जो इन्हें इनके लक्ष्य तक पहुंचा सकते हैं. अक्टूबर 2024 में जब शेख आसिफ ने पार्टी बनाई उन्होंने अपना स्टैंड क्लियर कर दिया था. उन्होंने कहा था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो मजहब का अपमान करने वालों को कठोर सजा दी जाएगी. इसके बाद जब अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ ऑपरेशन शुरू हुआ तो शेख आसिफ घुसपैठियों के पैरोकार बने. शेख आसिफ का कहना है कि जिनलोगों का जन्म महाराष्ट्र में हुआ, उन्हें कोई बाहर नहीं निकाल सकता. वो NRC के सख्त खिलाफ हैं. जिस तरह से उन्होंने मजहब के नाम पर पार्टी का नाम रखा. मतदाताओं की गोलबंदी में उसका नतीजा भी दिखा है. इस्लाम पार्टी के समर्थक अब मालेगांव से निकलकर राज्य और देश में चुनाव जीतने की बात कर रहे हैं. हम आपको बताते हैं कि इस्लाम पार्टी वाले क्या कह रहे हैं. 

मुसलमानों की परोपकारी
इस संकेत को समझिए. भारतीय राजनीति में धार्मिक प्रतीक प्रतिबंधित है लेकिन शेख आसिफ ने बहुत ही शातिराने अंदाज़ में  पार्टी का ऐसा नाम रखा, जिसका शॉर्ट फॉर्म इस्लाम हो गया. मतलब कानूनी तौर पर धर्म और धार्मिक नाम पहचान नहीं है लेकिन संदेश वही है. पार्टी के वजूद में इस्लाम के नाम के साथ-साथ मुसलमानों की पैरोकारी है. एनआरसी का विरोध है. इसी ने मालेगांव के मुसलमानों को आकर्षित किया. इसका मजहबी आकर्षण कितना अधिक है इसे ऐसे समझिए कि डेढ़ साल हुए हैं पार्टी बने हुए और इस डेढ़ साल में ही इस्लाम पार्टी ने सबसे पुरानी पार्टी के वजूद को मिटा दिया जिसका पहले यहां मेयर हुआ करता था. जिस कांग्रेस ने सालों तक मालेगांव पर राज किया. उस कांग्रेस को निकाय चुनाव में सिर्फ 3 सीटों पर समेट दिया. ये इस बात के संकेत हैं कि मालेगांव के मुसलमानों को अब शेख आसिफ जैसे नेता और इस्लाम पार्टी जैसे दल पसंद हैं और जिन्हें इस्लाम पार्टी पसंद नहीं है, उन्हें दूसरी ऐसी पार्टी पसंद आ रही है जिसकी कमान मुसलमान के हाथ में है.ॉ

AIMIM को 21 सीटें 
जिसके नाम में मुसलमानों को अपनी कौम दिखती है. इसलिए, मालेगांव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM यानी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. ओवैसी की पार्टी को 2017 के चुनाव में सिर्फ 7 सीटें मिली थी मालेगांव में और इस बार 21 सीटें मिली हैं. पूरे तीन गुना ज्यादा. जिस तरह से मालेगांव में ओवैसी की पार्टी का ग्राफ ऊपर चढ़ा है. उसके संकेत बहुत ही साफ हैं. असदुद्दीन ओवैसी की विचारधारा किसी से छिपी हुई नहीं है. वो स्पष्ट शब्दों में बोलते हैं. खुलकर मुसलमानों की पैरवी करते हैं और इसका असर उनके समर्थन में दिख रहा है. हम आपको बताते हैं कि मजहब के नाम पर खुली राजनीति करने वाले ओवैसी कैसे मुसलमानों के नेता बनकर उभर रहे हैं. ओवैसी खुद हैदराबाद से सांसद हैं. 2014 में उन्हें करीब 53 प्रतिशत वोट मिले थे. 2019 में वोटर प्रतिशत बढ़कर 59 पर पहुंच गया. तो 2024 में ओवैसी का वोट प्रतिशत साढ़े 66 प्रतिशत तक पहुंच गया. मतलब 10 सालों में ओवैसी का खुद अपना वोट साढ़े 13 प्रतिशत तक बढ़ गया. 

हैदराबाद में ओवैसी का वोट 
हैदराबाद में 43 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. वहां पर ओवैसी का ग्राफ लगातार बढ़ा है. पिछले साल बिहार में जब विधानसभा का चुनाव हुआ था. वहां भी मुस्लिम बहुत क्षेत्रों में ओवैसी का समर्थन बढ़ा. सीटें उतनी ही मिली जितनी 2020 में मिली थी, लेकिन वोट परसेंट में इजाफा हुआ. 2020 में एक दशमलव 24 प्रतिशत वोटर ने ओवैसी की पार्टी को वोट दिया था. जो 2025 में आकर 1 दशमलव 85 परसेंट हो गया. अब जब महाराष्ट्र में निकाय चुनाव हुआ है तो यहां भी पहली बार ओवैसी को पार्टी को 114 सीटें मिली हैं. AIMIM महाराष्ट्र की छठी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. ओवैसी की पार्टी को शरद पवार की पार्टी से ज्यादा सीटें मिलीं. ध्यान से सुनिएगा, शरद पवार की एनसीपी को बीएमसी में सिर्फ एक सीट मिली जबकि AIMIM को 8 सीटें मिली. राज ठाकरे की पार्टी भी मुंबई में ओवैसी की पार्टी से पीछे है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओवैसी की पार्टी को मुस्लिम युवा खुलकर वोट कर रहे हैं. 

ओवैसी क्यों बना मुसलिमों की पंसद?
ओवैसी जिस एक्सट्रीम लेवल पर बात करते हैं. जिस अंदाज़ में मुसलमानों को संदेश देते है. जिस तरह से उनके भाषणों में सर्वधर्म की बात नहीं होती. कथित धर्मनिरपेक्षता की चर्चा नहीं होती. जिस तरह वो सिर्फ मुसलमानों की बात करते हैं. कट्टर और भड़काऊ भाषण देते हैं. वो मुसलमानों को पसंद आ रहा है. विशेषकर युवा मतदाता आकर्षित हो रहे हैं. जिनका फोकस रोजगार पर होना चाहिए. वो मुस्लिम यूथ मजहब देखकर वोट डालता है. डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि धर्म को राजनीति में लाना, लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है. मालेगांव मॉडल इस खतरे का नया उदाहरण है. मालेगांव के नतीजों से तीन बातें बिल्कुल स्पष्ट है. पहली बात ये कि मुसलमानों को धर्मनिरपेक्षता की बजाय कौम की बात करने वाले पसंद आ रहे हैं. दूसरी बात ये कि जिस मुस्लिम बहुल इलाके में स्पष्ट रूप से मुस्लिम कैंडिडेट जीत रहे हैं, वहां पर उन पार्टियों को वोट दिया जा रहा है जो मजहब की कट्टरता को बढ़ाते हैं और तीसरी बड़ी बात ये है कि आजादी के बाद से जो पार्टियां, चाहे राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस हो या फिर अलग-अलग राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां हों, उनसे मुसलमानों की दूरी बन रही है. बस शर्त इतनी है कि वहां पर मुस्लिमों की आबादी ज्यादा हो और वहां पर AIMIM और इस्लाम पार्टी जैसे दल के कैंडिडेट खड़े हों. “मालेगांव मॉडल” देश के मौलानाओं को भी पंसद आ रहा है. 

सेक्युलर पार्टी 
हम आपको बताते हैं कि मौलाना क्या कह रहे हैं. स्पष्ट शब्द हैं, कोई लाग-लपेट नहीं हैं. एक पार्टी की जीत को इस्लाम की जीत कहा जा रहा है. असल में मौलाना जो कह रहे हैं यही शेख आसिफ का भी मकसद है. यही ‘मालेगांव मॉडल’ भी है. जिसमें कौम की पार्टी, कौम के नेता, कौम की जीत सबकुछ है. सियासी जीत को जिस तरह इस्लाम से जोड़कर प्रसार किया जा रहा है. जिस तरह से इस्लाम पार्टी का प्रचार हो रहा है इसका आकर्षण बिहार के किशनगंज तक दिख रहा है. हम आपको बताते हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों में किस तरह ‘इस्लाम पार्टी’ की चर्चा शुरू हो चुकी है. सीमांचल कभी कांग्रेस तो कभी आरजेडी का गढ़ था. लेकिन अब उसे मुस्लिम नेता और इस्लाम के नाम से जुड़ी पार्टी आकर्षित कर रही है. ऐसा सिर्फ एक जगह नहीं है. अलग-अलग हिस्सों में हो रहा है. इसका नुकसान देश की उन पार्टियों को सीधे-सीधे हो रहा है, जिनकी राजनीति धर्मनिरपेक्षता की धुरी पर घूम रही थी. जो अपने सियासी घोषणा-पत्र में तुष्टिकरण के चैप्टर लेकर चल रहे थे. मालेगांव के नतीजों को देखिए. कांग्रेस के जिस सांसद को 2024 में मालेगांव ने बढ़त दिलायी थी. उस कांग्रेस को सिर्फ तीन सीट मिली. जिस एनसीपी का मेयर था, वो खत्म हो गया. ये दोनों पार्टी कथित तौर पर सेक्युलर है.

मजहब के नाम पर कितनी पार्टी 
यही बिहार के सीमांचल में भी हुआ था. वहां भी मुस्लिम बहुत इलाकों में ओवैसी की पार्टी ने अपने कैंडिडेट खड़े किए थे और वहां पर धर्मनिरपेक्षता के स्वयंभू झंडाबरदार पार्टियां कांग्रेस और आरजेडी कहीं नहीं टिकी. जो प्रयोग महाराष्ट्र में अभी हुआ है, वो आने वाले समय में दूसरे राज्यों भी हो सकते हैं. किन किन पार्टियों और नेताओं के लिए मालेगांव मॉडल खतरे की घंटी बजा रहा है.ये हम आपको बताएंगे लेकिन उससे पहले आपको बताना चाहेंगे कि मजहब के नाम पर कितनी पार्टियां कहां-कहां हैं? असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM देशभर में उन तमाम सीटों पर चुनाव लड़ती है, जहां मुस्लिम मतदाता जीत-हार तय करते हैं. तेलंगाना में ओवैसी की पार्टी के सात विधायक हैं. महाराष्ट्र में इस्लाम पार्टी जबरदस्त एंट्री के बाद अब राज्य स्तरीय विस्तार की तैयारी में है. असम में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट हैं, जिसके मुखिया बदरुद्दीन अजमल हैं. केरल में यूनियन मुस्लिम लीग है. 

चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड पार्टी 
वैसे तो पीस पार्टी और अली सेना जैसी और भी कई पार्टिया हैं. लेकिन एमआईएम, AIUDF, इस्लाम पार्टी और UML  वो पार्टियां हैं, जो अपने-अपने राज्यों में मुसलमानों को धर्म के नाम पर आकर्षित कर रही हैं. आने वाले समय में और भी कई पार्टियां चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड हो सकती हैं. विशेषकर पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद बना रहे हुमायूं कबीर जनता उन्नयन पार्टी बनाने की घोषणा कर चुके हैं. हुमायूं कबीर ने जिस तरह से बाबरी मस्जिद का डेमो दिखाकर मुस्लिम पॉलिटिक्स में एंट्री की है, ये सत्ताधारी दल टीएमसी और सीएम ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी है. बंगाल की  294 विधानसभा सीटों में से लगभग 110 से 125 सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. ऐसे में मालेगांव मॉडल ममता बनर्जी को परेशान कर सकता है. उसके बाद यूपी में चुनाव होगा. यूपी में 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 35% से 50% के बीच है. 57 उच्च मुस्लिम आबादी वाली सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 34 सीटें जीती थीं.

अखिलेश यादव 
मालेगांव मॉडल अखिलेश यादव के लिए खतरे की घंटी है. असम में भी चुनाव होने वाला है वहां पर मालेगांव मॉडल कांग्रेस के लिए खतरा हो सकता है. इसका अंदाजा इन कथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को भी है. अब हम आपको बताते हैं, कांग्रेस के नेता इसे लेकर क्या कह रहे हैं. जिस कांग्रेस के हाथ से मुस्लिम वोटबैंक फिसलता जा रहा है. उसी की पार्टी के सबसे बड़े नेता और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कभी कहा था कि “धर्मनिरपेक्षता भारत की मजबूरी नहीं, उसकी पहचान है”. लेकिन इसी पहचान को हथियार बनाकर जिस तरह से 77 सालों से राजनीति हो रही है. जिस तरह स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने वोट बैंक तैयार किया. वही वोटबैंक अब मजहब के नाम पर उस पार्टी की ओर शिफ्ट हो रहा है जिसके लिए धर्मनिरपेक्षता सिर्फ पार्टी के नाम में है. पहचान में इस्लाम और प्रचार में कट्टरता है. मालेगांव नगर निगम 2001 में बना था. तब से लेकर आज तक वहां के मेयर मुस्लिम ही रहे. 

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वोट शिफ्ट

लेकिन अब तक वो कांग्रेस या एनसीपी के नेता के तौर पर रहे. लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है जब विशुद्ध रूप से एक मुस्लिम पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की है. कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां हाशिए पर चली गई है. यहां दो बातों को समझना आपके लिए जरूरी है. पहला ये कि आबादी में बहुमत होने के बाद मुसलमान इस्लामिक पार्टी की ओर शिफ्ट कर गए. इसका प्रयोग और दूसरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र और जिलों में हो सकता है. वैसे भी देश के कई इलाकों में इन दिनों मुस्लिम मोहल्ला और मुस्लिम जिला बनाने की मांग हो रही है. दूसरी अहम बात ये है कि मालेगांव मॉडल ना सिर्फ धार्मिक गोलबंदी के लिहाज से खतरनाक है. बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती है. पहले देश की राष्ट्रीय पार्टियों को अलग-अलग राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियों ने किनारे लगाया. अब लोकल पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियों के लिए चुनौती बन रही हैं.