
DNA Analysis: देश में जब से वंदेमातरम के सभी 6 छंदों का गायन अनिवार्य हुआ है तब से देश में एक वर्ग अपने आक्रोश का सार्वजनिक शाब्दिक प्रदर्शन कर रहा है. धार्मिक आस्था का संदर्भ देते हुए कहा जा रहा है कि हम सिर कटा देंगे. लेकिन वंदेमातरम नहीं गाएंगे. संक्षेप में ये तर्क दिया जा रहा है हमारे लिए धर्म पहले है राष्ट्र बाद में.
आंखों पर धार्मिक कट्टरवाद का मोटा चश्मा पहननेवालों और राष्ट्र के खिलाफ धर्मिक विश्वास को खड़ा करनेवालों को आज फ्रांस के मुसलमानों से सीखना चाहिए. इन्हें समझना चाहिए कि कैसे भारत से 6 हजार 600 किलोमीटर दूर फ्रांस में मुसलमान देश के कानून को मानने की शपथ ले रहे हैं और कैसे भारत में चंद कट्टरपंथी आधी-अधूरी जानकारी को आधार बनाकर ये जिद पाल रहे हैं हम कानून नहीं शरिया मानेंगे.
धर्म एक, धर्म के सिद्धांत एक, आस्था एक ही जैसी. क्या फिर 6600 किलोमीटर की दूरी धार्मिक नियम-कायदे को बदल देगी. ये सवाल बड़ा है. इस सवाल के पीछे दो बड़ी वजह है. पहली वजह है पेरिस की ग्रैंड मस्जिद की एक पुस्तक. जो फ्रांस के मुसलमानों को बता रही है कि उन्हें फ्रांस के कानून का मानते हुए अपने धार्मिक विश्वास का पालन करना है.
एमपी में एक मौलाना की बच्चों को सीधी चेतावनी
दूसरी खबर मध्य प्रदेश के उज्जैन से है जहां एक मौलाना कह रहे हैं जिस स्कूल में वंदेमातरम का गायन होगा उस स्कूल से हम अपने बच्चों को निकाल लेंगे. सोचिए दोनों एक ही धर्म इस्लाम के फॉलोअर हैं. लेकिन दोनों की सोच में कितना फर्क है. पहले कट्टरपंथ के दायरे में कैद छोटी सोच वाले मौलानाओं को बताते हैं कि पेरिस के मुसलमानों ने क्या कहा है. पेरिस की ग्रैंड मस्जिद ने एक पुस्तक प्रकाशित की है. करीब 100 पन्नों की इस किताब में फ्रांस के मुसलमानों को बताया गया है कि कैसे वो फ्रांस के कानूनों का पालन करते हुए अपने धार्मिक आस्था का पालन कर सकते हैं. संक्षेप में इस किताब के कुछ बड़े प्वाइंटस हम आपसे शेयर करते हैं. वंदेमातरम का विरोध करनेवाले मौलानाओं को ये गौर से देखना और समझना चाहिए. पेरिस की ग्रैंड मस्जिद की किताब में कहा गया है.
इस्लामिक नियम और फ्रांसीसी सिविल कानून में कोई विरोध नहीं है.
देशभक्ति ईमान का हिस्सा है. यानी हर मुसलमान का कर्तव्य है.
फ्रांस के कानून में जो स्त्री-पुरुष समानता की बात कही गई है इस्लाम भी इसकी वकालत करता है. सूरह अल-बकरा के हवाले से कहा गया है कि इस्लाम भी पुरुष और महिला में समानता को मानता है.
हिजाब को व्यक्तिगत चुनाव बताते हुए कहा गया है कि पहनावा सम्मानजनक होना चाहिए. नौकरी के लिए जरूरी हो तो हिजाब को हटाना जायज है.
गर्मियों के मौसम में रमजान के दौरान रोजा तोड़ने की अनुमति दी गई है.
ग्रैंड मस्जिद ने अपनी किताब में कहा है कि समलैंगिकता इस्लाम में हराम है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति समलैंगिक है तो उसे बीमार मानकर सम्मान और दया से पेश आना चाहिए.
ईशनिंदा पर संयम और गरिमा के साथ पेश आने की अपील की गई है. साथ ही दूसरे धर्मों का सम्मान करने की बात भी कही गई है.
100 पन्नों की किताब में साफ-साफ शब्दों में कहा गया है कि देशभक्ति पहले है. हिजाब जरूरी नहीं है. रमजान में रोजा तोड़ सकते हैं. समलैंगिकता का विरोध सही नहीं है. यानी फ्रांस में रहनेवाले मुसलमानों के लिए वहां का कानून पहले हैं, शरिया बाद में है. कानून का पालन करना अनिवार्य है. धर्म निजी विषय है.
क्या भारत में हो सकता है ऐसा?
सोचिए अगर यही बात भारत में कही गई होती तो क्या होगा. हाथ में पोस्टर लिए हजारों उपद्रवी सड़क पर उतर आए होते. जैसे आई लव मोहम्मद वाले प्रदर्शन के समय उतरे थे. हिजाब पर कोई टिप्पणी भी कर दे तो ये बंद बुद्धि वाले कट्टरपंथी कहेंगे, हमारी धार्मिक आस्था में दखल दिया जा रहा है. वंदेमातरम गायन को ये इस्लाम में हस्तक्षेप बता रहे हैं.
अपनी छोटी सोच के पिंजरे में कैद मौलाना बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं. ये कह रहे हैं, बच्चों को स्कूल से निकाल लेंगे..लेकिन वंदे मातरम नहीं गाने देंगे. मित्रो एक मौलाना पेरिस की ग्रैंड मस्जिद के हैं जो बता रहे हैं कि फ्रांस में शरिया नहीं कानून चलेगा. और एक ये मौलाना हैं जो कह रहे हैं कि साहब हम कानून नहीं मानेंगे. राष्ट्र गीत नहीं गाएंगे..और अगर राष्ट्र गीत गाने के लिए मजबूर किया गया तो अपने ही बच्चों का भविष्य बर्बाद कर देंगे. आज इन मौलानाओं को फॉलो करनेवालों को विवेकपूर्ण तरीके से सोचना और समझना चाहिए. तर्क और बुद्धि से बैर रखनेवाले ऐसे मौलाना और उनके वैचारिक मित्रो की वंदेमातरम को लेकर जानकारी कितनी सीमित और गलत है हम आपको सुनाएंगे. लेकिन पहले फ्रांस की बात करते हैं.
#DNAमित्रों | भारत के मुसलमान Vs फ्रांस के मुसलमान, फ्रांस में संविधान मानेंगे..भारत में ‘शरिया’?
स्कूल छोड़ देंगे..वंदे मातरम् नहीं गाएंगे?#DNA #DNAWithRahulSinha #VandeMataram #France #Muslim @RahulSinhaTV pic.twitter.com/ZIj6gkJ5q1
— Zee News (@ZeeNews) February 14, 2026
फ्रांस में 37 साल है सख्ती
कट्टरपंथियों के खिलाफ फ्रांस में सख्ती नई नहीं है. 1989 में यानी आज से 37 साल पहले फ्रांस में पहली बार हेडस्कार्फ विवाद में तीन लड़कियों को स्कूल से निकाला गया था. तब से एक के बाद एक फ्रांस ने कई ऐसे कानून बनाएं जो मौलानाओं की शरिया वाली सोच से 360 डिग्री खिलाफ हैं. भारत में वंदेमातरम का विरोध करनेवाले मौलाओं को आज हमारी ये रिसर्च बहुत गौर से सुननी चाहिए. फ्रांस ने 2004 में स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों को बैन कर दिया गया. असर ये हुआ की मुस्लिम लड़िकयां स्कूल में हिजाब और स्कार्फ नहीं पहन सकती हैं. मौलाना कहते हैं कि शरिया में महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य है.
2010 में फ्रांस ने बुर्का और नकाब पर बैन लगा दिया. मौलाना कहते हैं की नकाब और बुर्का महिलाओं के लिए अनिवार्य है. और फ्रांस का कानून कहता है सार्वजनिक जगहों पर चेहरा नहीं ढंक सकते हैं.
2016 में फ्रांस ने बुर्किनी यानी पूरे शरीर को कवर करनेवाले स्विम सूट को बैन कर दिया. मौलाना कहते हैं कि बुर्किनी महिलाओं के लिए अनिवार्य है. हालांकि बाद में कोर्ट ने फ्रांस सरकार के इस फैसले को रद्द कर दिया
2021 में फ्रांस में एंटी सेपरेटिज्म कानून बनाया. शरिया चार शादी की इजाजत देता है. फ्रांस ने बहुविवाह और फोर्स्ड मैरिज को बैन कर दिया.
2023 में फ्रांस ने स्कूलों में अबाया और कमीस को स्कूलों में बैन कर दिया. मौलाना कहते हैं कि अबाया, कमीस इस्लामिक पहचान का हिस्सा है. लेकिन फ्रांस का कानून कहता है ये नहीं चलेगा.
फ्रांस में बैन है बुर्का-नकाब
मौलाना जिस हिजाब को, बुर्का नकाब को, अबाया को, चार शादियों को इस्लाम की पहचान से जोड़ते हैं. फ्रांस ने उन्हें बैन कर दिया. अब पेरिस की ग्रैंड मस्जिद की किताब कह रही है सरकार सही है, कानून सही है. कानून का पालन करिए, अपनी आस्था को कानून के दायरे में रखिए. सोचिए अगर भारत में ऐसा होता तो क्या होता. हंगामा होता. बवाल होता. चार साल पुरानी बात है. जनवरी 2022 में कर्नाटक के उडुपी में शिक्षा संस्थानों में हिजाब बैन किया गया था तो कट्टरपंथियों ने सड़क पर हंगामा किया था.
देशभक्ति नहीं धर्मभक्ति प्रमुख
चार साल बाद भी ये कट्टरपंथी एक छोटी सोच के दायरे में ही कैद है. फ्रांस के मुसलमान शपथ ले रहे हैं कि हम पहले कानून को मानेंगे. लेकिन 6600 किलोमीटर दूर हमारे देश के मौलाना कह रहे हैं सिर कटा देंगे लेकिन कानून नहीं मानेंगे. फ्रांस के मौलाना कह रहे हैं देशभक्ति धर्म का हिस्सा है. लेकिन हमारे देश के मौलाना क्या कह रहे हैं. देशभक्ति नहीं धर्मभक्ति प्रमुख है. ये कह रहे हैं गर्दन कटा देंगे लेकिन वंदेमातरम नहीं गाएंगे. क्या 6600 किलोमीटर की दूरी से धर्म के सिद्धांत बदल जाते हैं. नहीं बदल सकते. कोई इन बंद बुद्धि मौलानाओं को समझाए की ऐसा नहीं होता है. पता नहीं इनके दिमाग में शरिया का कौन सा वाला एडिशन अपलोड है. पता नहीं इनके दिमाग ये देश विरोधी सोच किस गोंद से चिपक गई है कि वो हटती ही नहीं.
महजब के नाम पर डबल स्टैंडर्ड
ये महजब के नाम पर डबल स्टैंडर्ड है. अगर ऐसा नहीं होता तो फ्रांस के मौलाना भी फ्रांसीसी कानून का विरोध करते. लेकिन वहां तो कानून प्रथम की शपथ ली जा रही है. अब देखिए ना हमारे देश में छोटी सोच वाले चंद कट्टरपंथी एक सुर में वंदेमातरम का विरोध कर रहे है. कहते हैं वंदेमातरम इस्लाम विरोधी है. वंदेमातरम में मूर्तिपूजा का जिक्र है. आज हमने सोचा इनसे पूछते हैं कि भाई साहब जरा विस्तार से बताएं की वंदे मातरम के किस छंद में कौन सा वाक्य इस्लाम विरोधी है. वंदेमातरम की किस लाइन, किस शब्द से आपकी धार्मिक भावनाएं आहत होती है. बहुत दिलचस्प जवाब मिले. आप भी ध्यान से सुनिए
विरोध कर रहे हैं लेकिन जानकारी नहीं है किसका विरोध कर रहे हैं. बस कहीं से सुन लिया की वंदेमातरम इस्लाम विरोधी है. इसे रट लिया और इसी रटंत विद्या को तर्क बनाकर सिर कटाने, स्कूल छोड़ने का ऐलान होने लगा. सोचिए इन्हें क्या कहा जाए. कहीं से ऐलान हो जाता है कि ये नियम इस्लाम विरोधी है, ये इस्लाम का अपमान है. उसके बाद कोई अपना दिमाग नहीं लगाता. भीड़ विरोध करने सड़क पर उतर जाती है. आई लव मोहम्मद वाले प्रदर्शन में भी यही हुआ था.
अन्य देशों में कानून पहले
मतलब किसी ने इनमें विरोध वाली चाबी भर दी और ये खिलौने की तरह विरोध करने लगे. मतलब इनकी तर्कक्षमता को, इनकी बुद्धि को हैक कर लिया गया है. ये हैकिंग किसने की है. उन मौलानाओं ने जो शरिया की मनमानी व्याख्या करते हैं. हम इन्हें ही बंद बुद्धि मौलाना कह रहे हैं. फ्रांस में जो तरक्की पसंद मौलाना हैं वो कह रहे हैं भाई कानून पहले है. देशभक्ति पहले है. शरिया बाद में है. अगर फ्रांस में रहना है तो फ्रांस के नागरिक बनकर रहिए. मुसलमान बनकर नहीं. लेकिन भारत के बंद बुद्धि मौलाना ठीक इससे उलट बात कह रहे हैं. वो लोगों को उकसा रहे हैं. बरगला रहे हैं. कह रहे हैं कि शरिया ही सबकुछ है. संविधान, कानून, देशभक्ति उसके बाद है. अफसोस की बात ये है कि ये बंद बुद्धि मौलाना बदलते समय के साथ कदमताल नहीं कर रहे हैं. और अपनी पिछड़ी सोच दूसरों पर थोप रहे हैं.
ये आम मुसलमानों के भविष्य पर ताला लगा रहे हैं, काश ये अपनी जिम्मेदारी निभाते. काश ये पेरिस की ग्रैंड मस्जिद जैसी सोच को अपनाते. काश ये आम मुसलमानों को बदलाव के साथ आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते. लेकिन ये ऐसा नहीं करेंगे. क्योंकि ये तो छोटी कट्टरपंथी सोच के दायरे में कैद हैं. इनकी बुद्धि बंद हो गई है. इसलिए आज हम तरक्की पंसद लोगों से कहेंगे कि खुली आंखों से दुनिया को देखिए..दुनिया के बदलाव को समझिए और आगे बढ़िए.

