
Mamata Banerjee: स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो लोग आपके विरोध में खड़े होते हैं, वे अनजाने में आपकी शक्ति बढ़ा रहे होते हैं. ये सारे सनातन विरोधी अतिवादी यही कर रहे हैं, हालांकि सनातनियों की जो शक्ति बढ़ रही है, उसका असर देश की राजनीति में भी दिख रहा है. जो ममता बनर्जी स्वंय को धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा झंडाबरदार बताती हैं. जिनपर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगता है. जो ममता बनर्जी दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा पंडाल में खड़ी होकर इस्लामिक गीत पर झूमती हैं. हिंदुओं को दरकिनार कर मुस्लिमों के लिए अति उदार रहने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अब मंदिर बनवा रही हैं और सुनिए पिछले 15 सालों जिन्होंने सिर्फ एक मंदिर बनवाया वो अब अचानक 2-2 मंदिर बनवा रही हैं. एक मंदिर की आधारशिला रख दी हैं, दूसरे की रखने वाली हैं. सवाल है कि अचानक ही ममता बनर्जी का हृदय परिवर्तन कैसे हुआ है? अब हम इन्हीं सवालों का जवाब जानेंगे और ममता बनर्जी के मंदिर प्रेम का विश्लेषण करेंगे.
ममता बनर्जी ने रखी दुर्गा आंगन की आधारशिला
ममता बनर्जी ने ‘दुर्गा आंगन’ की आधारशिला रखी हैं. कोलकाता के न्यू-टाउन में ये मंदिर बन रहा है. 2 लाख वर्ग फुट में इसका भव्य परिसर होगा. परिसर का गर्भगृह 54 मीटर ऊंचा होगा. वहीं पूरे प्रांगण में 108 भव्य प्रतिमाएं और 64 सिंह मूर्तियां स्थापित की जाएंगी. एक विशाल सांस्कृतिक संग्रहालय का निर्माण भी किया जाएगा. ममता बनर्जी जब दुर्गा आंगन की आधारशिला रखने पहुंची थी तब उन्होंने भाषण दिया. जिसमें पूरा जोर इस पर था कि वो सच्ची धर्मनिरपेक्ष हैं. सनातन उनका धर्म है. ममता ने गिनवाया कि उन्होंने कितने हिंदू धार्मिक स्थलों का विकास किया. उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप से वो बहुत आहत होती हैं. फिर उन्होंने कहा कि सिर्फ कोलकाता में ही नहीं, बल्कि वो अगले महीने सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर की आधारशिला भी रखने वाली हैं. यह बंगाल का सबसे बड़ा शिव मंदिर होगा, जो 25 एकड़ में बनाया जाएगा.
ये भी पढ़ें- MGNREGA में बदलाव ने रुलाया, अब मजदूरों की हमदर्द बनी पंजाब सरकार; पीएम तक भेजेगी 10 लाख लोगों की चिट्ठी
महाकाल का मंदिर बनवा रहीं दीदी
ये वही ममता बनर्जी हैं, जिन्हें रामनामी नारे से दिक्कत होती थीं. जो जय श्रीराम सुनकर क्रोधित हो गईं थी. वही अब महाकाल का मंदिर बनवा रही हैं. मंदिर को लेकर उनका ये उद्गार ऐसे समय में आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा का चुनाव होना है. राजनीति में समय, स्थान और परिस्थितियां सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती हैं. ममता बनर्जी के हृदय-परिवर्तन को भी इस दृष्टिकोण से देखा जा रहा है क्योंकि ममता बनर्जी की पहचान उन गिने-चुने नेताओं में होता है, जिन्हें आप मुस्लिम तुष्टीकरण वाले पुरोधाओं की श्रेणी में रख सकते हैं. ममता बनर्जी ने इमामों को मासिक भत्ता देना शुरू किया था, जिसका बड़े स्तर पर विरोध हुआ था. ममता बनर्जी वो नेता हैं जिन्होंने मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन पर रोक लगा दी थी. ममता बनर्जी वो मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अंडर लाइन करके ये कहा था कि मुस्लिम इलाकों में रामनवमी का जुलूस नहीं जाना चाहिए.
ये भी पढ़ें- नए साल से पहले कश्मीर का माहौल बिगाड़ने की साजिश फेल, आतंकी ठिकाने का भंडाफोड़, मिले गोला-बारूद, प्रेशर कुकर
चुनाव से पहले ममता का मंदिर प्रेम
वही ममता बनर्जी जब अचानक ही चुनाव से पहले अपना मंदिर प्रेम दिखाती हैं. खुद को सनातनी बताने के लिए उदाहरण सहित व्याख्या करती हैं. तब ये जानना जारूरी है कि ममता बनर्जी को इसकी जरूरत क्यों पड़ी है. मुख्यत: इसके तीन कारण हैं. पहला ये कि ममता बनर्जी ने महाकाल मंदिर बनाने की घोषणा ऐसे समय में की है, जब हुमायूं कबीर बाबरी मस्जिद बनवा रहे हैं यानी उन्हीं की पार्टी के विधायक बाबरी मस्जिद के नाम पर उनके वोटबैंक में जबरदस्त सेंधमारी की तैयारी में है. पिछली बार 75 प्रतिशत मुस्लिम वोट ममता बनर्जी को मिले थे, लेकिन इस बार जिस तरह हुमायूं कबीर के बाबरी-प्लान ने मुस्लिमों को गोलबंद किया है, जिस तरह बाबरी के पीछे बंगाल के मुस्लिम दौड़ रहे हैं, उसने ममता बनर्जी को लग रहा है कि जो एकमुश्त वोट उन्हें मिल रहा था, शायद उसमें दरार पड़ जाए. दूसरी बात ये है कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में अपने आक्रामक हिंदुत्व के एजेंडे को पूरी शक्ति के साथ आकार दे रही है. 2019 और 2021 के चुनाव में बीजेपी के हिंदू वोट बढ़े थे. 2021 में तो बीजेपी को लगभग 38-40% वोट शेयर मिला था। 147 सीटें ऐसी थी, जहां बीजेपी सिर्फ 7 प्रतिशत वोट के अंतर से हारी थी. ममता बनर्जी को डर है कि अगर 5-7 प्रतिशत और हिंदू वोटर बीजेपी के साथ चले गए और मुस्लिम वोट बंट गए तो टीएमसी सत्ताहीन हो सकती है.
बीजेपी के वोट काटना चाहती हैं ममता बनर्जी
तीसरी और अहम बात ये है कि ममता बनर्जी की छवि ऐसे नेता की बन चुकी हैं, जिसमें वो और तुष्टीकरण दोनों एक-दूसरे के पर्याय जैसे लगने लगे हैं. वो इस इमेज को तोड़ना चाहती हैं. वो बीजेपी के हार्ड हिंदुत्व को अपने सॉफ्ट हिंदुत्व से काटना चाहती हैं. अब आप समझ सकते हैं कि उन्हें अचानक ही मंदिर निर्माण की याद क्यों आई? बीजेपी कह रही है कि SIR में बंगाल में जो 58 लाख मुस्लिम वोटर कटे, उनमें एक बड़ा हिस्सा उन बांग्लादेशियों का भी था, जिन्हें अब वापस जाना पड़ा है, जो टीएमसी के वोटर थे. इसलिए घुसपैठिये भागे तो ममता ‘महाकाल’ के सहारे दिख रही हैं. इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं है कि जो कुछ हो रहा है, वो राजनीतिक फायदा और नुकसान के हिसाब से ही हो रहा है. पिछले 15 सालों में ममता बनर्जी सेंटर टू लेफ्ट इतना जा चुकी हैं, जहां से वो मुस्लिम वोटबैंक के गरजपरस्त नेता के तौर पर दिख रही हैं. बीजेपी भी इसी को हथियार बनाकर इसबार वोटयुद्ध में उनपर सियासी प्रहार कर रही है. यही कारण है कि ममता स्वयं को सनातनी बताकर महाकाल के सहारे पश्चिम बंगाल के अपने राजनीतिक किले को सुरक्षित करना चाहती हैं.

