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Unnao Rape Case Update: उन्नाव रेप केस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने आरोपी और पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को मिली जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है, जिसमें सेंगर की सजा निलंबित करते हुए उसे जमानत दी गई थी. इसके पहले दिसंबर 2019 में लोअर कोर्ट ने उन्नाव रेप केस मामले में कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी और 25 लाख रुपए जुर्माना भी लगाया था. मामले की गंभीरता और पीड़िता के साथ हुई क्रूरता को देखते हुए यह फैसला देशभर में चर्चा का विषय बना था. अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इस केस को किस तरह से लेता है? पीड़िता को मिलेगा न्याय या सेंगर को मिलेगी जमानत?

अब दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में सेंगर की अपील पर सुनवाई के दौरान उसकी सजा निलंबित करते हुए जमानत दे दी थी. इसी फैसले को लेकर CBI ने आपत्ति जताई है और सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है. अब शीर्ष अदालत इस याचिका पर सुनवाई कर यह तय करेगी कि सेंगर को दी गई जमानत बरकरार रहेगी या रद्द की जाएगी. हालांकि कुलदीप एक अन्य हत्या के मामले में पहले भी दोषी ठहराए जा चुके हैं जिसके लिए उन्हें 10 साल की सजा भी सुनाई जा चुकी है. अब दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद CBI ने इस फैसले का गहराई से अध्ययन किया और कुलदीप सेंगर को सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया. 

पूरे मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष ने इस मामले को अत्यंत गंभीर बताते हुए दलील दी कि दोषी को किसी भी तरह की राहत नहीं दी जानी चाहिए. अभियोजन पक्ष ने कहा कि अपराध की प्रकृति और उसके सामाजिक प्रभाव को देखते हुए सजा में कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए, जबकि बचाव पक्ष ने अपील लंबित होने का हवाला देते हुए कुलदीप सेंगर के लिए राहत की मांग की. दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर 2025 को एक अहम आदेश पारित किया. कोर्ट ने अपील के अंतिम निपटारे तक दोषी सेंगर की सजा को निलंबित कर दिया और कुछ सख्त शर्तों के साथ उसे जमानत दे दी. हालांकि, कोर्ट के आदेश के बावजूद सेंगर को फिलहाल जेल से बाहर नहीं आना है, क्योंकि उससे जुड़ी अन्य कानूनी प्रक्रियाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं.

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कुलदीप सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट ने कैसे दे दी जमानत?
दिल्ली हाईकोर्ट के मुताबिक कुलदीप सेंगर पर इस केस में POCSO एक्ट का उल्लंघन पूरी तरह से साबित नहीं होता दिखाई देता है. इसके लिए कोर्ट ने इन प्वाइंटर्स के बाद ये फैसला सुनाया है. 
 

  • कोर्ट के आदेश के अनुसार, आरोपी को जमानत देने का आधार यह रहा कि प्रथम दृष्टया उसके खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का मामला नहीं बनता पाया गया. कोर्ट ने कहा कि प्राप्त तथ्यों और रिकॉर्ड के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है कि आरोपी पर POCSO की उन धाराओं का स्पष्ट रूप से उल्लंघन साबित नहीं होता, जिनमें कठोर दंड का प्रावधान हो. कोर्ट ने अपने आदेश में POCSO अधिनियम की धारा 5 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि यह धारा उन विशेष परिस्थितियों को परिभाषित करती है, जिनमें किसी बच्चे के साथ हुए यौन हमले को Aggravated Penetrative Sexual Assault माना जाता है.

  • दिल्ली हाईकोर्ट के अनुसार, इस मामले में प्रथम दृष्टया ऐसी परिस्थितियां सामने नहीं आईं, जो धारा 5 के तहत अपराध को गंभीर श्रेणी में लाने के लिए आवश्यक हों. इसी आधार पर अदालत ने यह माना कि आरोपी को जमानत दी जा सकती है, हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि यह निष्कर्ष केवल जमानत के स्तर पर है और इससे मामले के अंतिम निपटारे या ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने बताया कि अगर किसी नाबालिग के साथ यही अपराध कोई लोक सेवक अधिकारी, पुलिसकर्मी द्वारा पुलिस स्टेशन के भीतर, किसी अस्पताल के कर्मचारी द्वारा अस्पताल में या फिर जेल कर्मचारी ने किया होता तो इस मामले में मिनिमम 20 साल की सजा बनती और उसे उम्रकैद में बढ़ाया जा सकता था. वहीं सेंगर के मामले में ट्रायल कोर्ट ने इस जुर्म के लिए इस आधार पर सज़ा दी थी कि वह ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा में आता है. जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर को ‘पब्लिक सर्वेंट’ नहीं माना था.

  • इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने मान लिया कि कुलदीप सेंगर को POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) या IPC के सेक्शन 376(2)(b) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता. इसके बाद हाईकोर्ट ने कहा कि सेंगर POCSO एक्ट के सेक्शन 5(p) के दायरे में नहीं आता, जो किसी नाबालिग को ‘भरोसे या अधिकार की स्थिति’ में गंभीर पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के लिए सजा के लिए जिम्मेदार ठहराता हो. 

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