
RAC – Reservation Against Cancellation: अब बात उस हर शख्स की जरूरत से जुड़ी, जो ट्रेन में अपनी कंफर्म सीट के लिए भगवान से प्रार्थना करता है, लेकिन उसे मिलता है- RAC यानी Reservation Against Cancellation. क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप बाजार से आधा लीटर दूध खरीदते हैं, तो पैसे एक लीटर के क्यों नहीं देते? जब आप आधा किलो सेब खरीदते हैं, तो दाम पूरे किलो के क्यों नहीं चुकाते? लेकिन भारतीय रेलवे में यह ‘अन्याय’ दशकों से चल रहा है. आपको मिलती है ‘आधी सीट’, लेकिन रेलवे आपसे वसूलता है ‘पूरा किराया’. इस गुणागणित की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि अब तो पीएसी (PAC) यानी संसद की लोक लेखा समिति ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है.
पूरी बर्थ नहीं मिली, तो किराया पूरा क्यों?
संसद की समिति ने दो टूक कहा है- जब यात्री को पूरी बर्थ नहीं मिली, तो किराया पूरा क्यों? समिति ने रेलवे को सुझाव दिया है कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे RAC यात्रियों को उनके किराए का एक हिस्सा वापस मिल जाए.
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कई बार आरएसी टिकट वाले यात्री चार्ट बनने के बाद भी आरएसी श्रेणी में ही रह जाते हैं और उन्हें पूरा बर्थ नहीं मिल पाता. ऐसे में उनसे पूरा किराया लेना उचित नहीं है. समिति ने कहा है कि रेलवे को ऐसा मैकेनिज्म बनाना चाहिए, जिससे उन यात्रियों को किराए का कुछ हिस्सा वापस किया जा सके, जिन्हें यात्रा के दौरान सीट शेयर करनी पड़ती है या पूरा बर्थ नहीं मिलता.
यानी आधा बर्थ मिले तो किराया पूरा न लिया जाए और किराए का एक हिस्सा वापस लौटाया जाए.
क्या इशारा कर रहे आंकड़े?
आंकड़ों का गणित समझिए. रेलवे RAC के जरिए हर साल करीब 4 से 8 हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई करता है. AC-3 टायर में पहले 2 बर्थ RAC के होते थे, अब 4 कर दिए गए हैं. मतलब एक बोगी में 8 लोग ऐसे सफर कर रहे हैं जो ‘आधी सीट’ पर ‘पूरा पैसा’ दे रहे हैं.
नए नियमों का विरोधाभास तो देखिए, वंदे भारत स्लीपर और अमृत भारत जैसी 13 ट्रेनों में RAC एंट्री बंद कर दी गई है. यानी या तो कंफर्म बर्थ पर सफर कीजिए या फिर घर बैठिए. समस्या का समाधान ‘नो एंट्री’ नहीं, ‘उचित किराया’ है.
#DNAमित्रों | सीट आधी..किराया फुल..क्यों हो कबूल? ट्रेन यात्रा पर PAC के दृष्टिकोण का विश्लेषण#DNA #DNAWithRahulSinha #RAC #IndianRailway #Train@RahulSinhaTV pic.twitter.com/ycU2SHthon
— Zee News (@ZeeNews) February 7, 2026
अब आप खुद सोचिए. रातभर के सफर में एक शख्स 12 घंटे लगातार पैर सिकोड़कर बैठता है क्योंकि उसके पास सोने की जगह नहीं, लेकिन उसके सामने वाला व्यक्ति उतने ही पैसे देकर सो रहा है, और RAC यात्री भी पूरे पैसे देकर जाग रहा है. ये मानसिक और शारीरिक शोषण नहीं तो क्या है?
रेलवे का तर्क होता है कि हम आपको ‘यात्रा की गारंटी’ दे रहे हैं. लेकिन क्या गारंटी के नाम पर ‘अतिरिक्त वसूली’ जायज है? इसलिए RAC टिकट वालों की यात्रा पर रोक के बदले यात्रा पूरी होते ही ‘आंशिक रिफंड’ सीधे यात्री के बैंक खाते में भेजने की व्यवस्था होनी चाहिए.
