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DNA on New York Times report on RSS: अमेरिका का एक मशहूर अखबार है न्यूयॉर्क टाइम्स. ये दुनिया भर के लेफ्ट-लिबरल सोचवालों का आश्रय स्थल है. ये अखबार खुद को वस्तुनिष्ठ यानी निष्पक्ष बताता है. लेकिन असल में ये लेफ्ट-लिबरल नैरेटिव का ध्वजवाहक है. ये पत्रकारिता नहीं पक्षकारिता करता है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने भारत विरोधी बौद्धिक विद्वेष को शब्दों में समेटकर एक लेख प्रकाशित किया.

न्यूयार्क टाइम्स ने फिर दिखाई ओछी हरकत

इस लेख का शीर्षक यानी हेडलाइन है फ्रॉम द शैडोज टू पावर: हाउ द हिंदू राइट रिशेप्ड इंडिया. इसका हिंदी अनुवाद हुआ ‘अंधेरे से सत्ता तक: हिंदू दक्षिणपंथ ने भारत को कैसे नया रूप दिया’. हेडलाइन में इस्तेमाल शब्द हिंदू दक्षिणपंथ को सुनकर लेख लिखनेवालों  की वैचारिकी को आसानी से समझा जा सकता है.

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इस लेख में मुद्दा बनाया गया है आरएसएस को. भारत को निशाना बनाने के लिए आरएसएस को टारगेट करना लेफ्ट-लिबरल समूह का पसंदीदा शगल है. वैश्विक एंटी इंडिया नैरेटिव नेटवर्क के सदस्य न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी यही किया है. अपने लंबे चौड़े लेख में पक्षकारिता करते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स ने आरएसएस के लिए क्या-क्या लिखा है पहले हम आपको बताते हैं. 

RSS एक रहस्यमयी, बेहद ताकतवर, ‘फार-राइट’ यानी धुर दक्षिणपंथी संगठन है. RSS भारत की गुप्त इल्यूमिनाटी है यानी ऐसा संगठन है जो हिंदू धार्मिक पुनर्जागरण का दावा करता है. RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ कर ली है और भारत के धर्मनिरपेक्ष गणराज्य को कमजोर कर रहा है. 

RSS को बताया साजिश रचने वाला संगठन

पूरे लेख में आरएसएस के लिए ‘शैडोई कबाल’ यानी गुप्त साजिश रचने वाला गुट, ‘गुप्त संगठन’, ‘अर्धसैनिक अनुशासन’, ‘सुप्रीमेसी’ यानी श्रेष्ठता का समर्थक जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है. 

कुल मिलाकर इस कथित विश्लेषण या पक्षकारिता का सार संक्षेप यही है कि आरएसएस एक धुर दक्षिणपंथी संगठन है जिसने भारत के सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है. जिस अमेरिका में ये अखबार छपता है उसी अमेरिका के विद्वान लेखक मार्क ट्वेन ने कहा है कि अगर आप तथ्य को अपने पक्ष में नहीं कर सकते, तो कम से कम उसे भ्रमित कर दें. यानी तथ्यों को ऐसे पेश करें कि सच को लेकर लोगों के मन में संदेह पैदा हो जाए.

पक्षकारिता कर रहे न्यूयॉर्क टाइम्स ने यही किया है. विचारों की स्वस्थ और तर्कसंगत आलोचना करना लोकतांत्रिक समाज का अधिकार है. लेकिन पत्रकारिता के नाम पर झूठ परोसना, तथ्यों में अपनी भारत विऱोधी कुंठा की मिलावट करना ये पाप है. न्यूयॉर्क टाइम्स के कुंठित विश्लेषकों को समझना चाहिए कि RSS रहस्यमयी या गुप्त संगठन नहीं है. पूरे देश में आरएसएस की शाखाएं लगती हैं, कार्यक्रम होता है. लाखों स्वंयसेवक रोज इन शाखाओं मे शामिल होते हैं.

दक्षिणपंथी नहीं बल्कि सांस्कृतिक संगठन है आरएसएस

आरएसएस धुर दक्षिणपंथी संगठन नहीं हैं. यह सांस्कृतिक संगठन हैं. जो सनातन और भारत भूमि पर रहने वाले हर भारतीय के हित के लिए काम करता हैं. RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ नहीं की है. समझिए अगर संस्थाओं में काम करनेवाले लोग आरएसएस के राष्ट्रहित के कामकाज से जुड़े हैं तो ये घुसपैठ नहीं है. 

न्यूयॉर्क टाइम्स अपने वैचारिक मित्रो यानी भारतीय लेफ्ट लिबरल लोगों के विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थाओं में घुसपैठ पर मौन है. गांधीजी ने कहा था कि सत्य ही ईश्वर है. सत्य की गलत व्याख्या या छिपाना सबसे बड़ा पाप है.

न्यूयॉर्क टाइम्स में अगर थोड़ी सी भी शर्मिंदगी बची हो तो उसे अपने पाप के लिए प्रायश्चित करना चाहिए और भारतवासियों से माफी मांगनी चाहिए. हम न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकों और नीति निर्धारकों से कहेंगे कि उन्हें सबसे पहले अपने आसपास देखना चाहिए.

ममदानी ने आतंकी के वकील को बनाया सलाहकार

न्यूयॉर्क टाइम्स को आज अपने शहर के बारे में चिंता करनी चाहिए जहां जोहरान ममदानी ने आज मेयर पद की शपथ ली और अपना कानूनी सलाहकार उस रमजी कासेम को बनाया जो 9-11 आतंकी हमले के आरोपियों का डिफेंस लॉयर रहा है. लेकिन वहां इनकी नजर नहीं पड़ेगी. क्योंकि इन्हें..आतंकवाद के हितैषी अच्छे लगते हैं. और स्वयंसेवी..कट्टरपंथी लगते हैं. 

ये विश्लेषण नहीं न्यूयॉर्क टाइम्स और वैश्विक एंटी इंडिया नैरेटिव नेटवर्क के कुंठा की भद्दी अभिव्यक्ति है. सच से इसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. ये भारत विरोधी झूठे नैरेटिव का भद्दा प्रदर्शन है. प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने कहा है कि सबसे खतरनाक झूठ वह है जो आधे सच पर आधारित हो.

न्यूयॉर्क टाइम्स के कथित विश्लेषकों ने RSS के संदर्भ में आधे सच को आधार बनाकर अपनी कुंठा के मुताबिक झूठा नैरेटिव गढ़ा है. लेख में न्यूयॉर्क टाइम्स ने छापा है कि शुरुआती सरसंघचालक यूरोप की फासीवादी पार्टियों से प्रभावित थे. 

गोलवरकर की किताब में लिखा है सारा सच

संघ के प्रमुख रहे माधव सदाशिव गोलवरकर ने अपनी पुस्तक में यहूदियों के खिलाफ हिटलर के अत्याचार का उदाहरण अपनी पुस्तक में दिया है. न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि गोलवरकर चाहते थे कि भारत में भी गैर हिंदुओं को यहूदियों की तरह कोई अधिकार नहीं मिले. अब न्यूयॉर्क टाइम्स के इस अर्धसत्य और तथ्यों में कुंठा की मिलावट को समझिए. पहली बात, माधव सदाशिव गोलवरकर ने किन संदर्भों में हिटलर और यहूदियों का संदर्भ अपनी पुस्तक में दिया है उसकी पड़ताल नहीं की गई है.

दूसरी बात अगर न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने ही तर्क को सही माने की भारत को RSS कंट्रोल कर रहा है तो उसे ये बताना चाहिए की भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों में कहां कटौती की गई है. न्यूयॉर्क टाइम्स ये नहीं बताएगा. पता है क्यों, क्योंकि ये सच नहीं है. न्यूयॉर्क टाइम्स को भारत विरोधी नैरेटिव बनाना था. आरएसएस को निशाना बनाकर भारत को बदनाम करना था, इसलिए उसके कथित विश्लेषकों ने आधे-अधूरे तथ्यों को जोड़ा, उसमें अपनी कुंठा को मिलाया और विष से लैस एक कथित विश्लेषण तैयार कर दिया. ये बौद्धिक पाप है.

ब्रिटिश लेखर एल्डस हक्सले ने कहा है कि तथ्य अपने आप में कुछ नहीं कहते, उनकी व्याख्या ही सब कुछ तय करती है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने तथ्यों की व्याख्या ऐसे की है जैसे भारत में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का राज चल रहा है. 

फर्जी खबरों में फंसता रहा है अखबार

आज हम न्यूयॉर्क टाइम्स और उसके बौद्धिक दुराग्रह पर प्रसन्न होनेवालों को आरएसएस के 100 सालों के सामाजिक कार्यों की लिस्ट नहीं गिनाएंगे. आज हम न्यूयॉर्क टाइम्स की कथित स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को आईना दिखाएंगे. 

इसी साल राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने न्यूयॉर्क टाइम्स पर 15 बिलियन डॉलर का मानहानि का केस किया, ट्रंप ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनकी प्रतिष्ठा को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया. 

एक पुराना मामला भी आपको बता देते हैं. साल 2003 में न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जेसन ब्लेयर पर खबरों में धोखाधड़ी और फैब्रिकेशन यानी खबरे गढ़ने का आरोप लगा था. जांच में ये आरोप सही पाए गए थे. 

गिरती जा रही न्यूयार्क टाइम्स की सब्सक्रिप्शन्स

साफ है झूठी एकतरफा रिपोर्टिंग, झूठा नैरेटिव गढ़ना और फैब्रिकेटेड यानी फर्जी खबरे छापना न्यूयॉर्क टाइम्स के DNA में हैं. इसलिए पिछले पांच साल में हर साल न्यूयॉर्क टाइम्स की प्रिंट सब्सक्रिप्शन्स में गिरावट आ रही है.