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ऐसा नहीं है कि 30 साल पुरानी एक तस्वीर से कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को पहली बार आरएसएस और भाजपा की संगठन शक्ति का आभास हो रहा है. हां, यह कहने की टाइमिंग जरूर मैसेज लिए हुए हैं. उन्हें कांग्रेस के संगठन में सब कुछ ठीक नहीं लग रहा है. जब से दिग्विजय ने संघ की तारीफ की है, कांग्रेस में कुछ लोग खुलकर उन्हें कोसने लगे हैं. ऐसे में एमपी की सियासत में उनके दखल, दूसरे धड़े से कथित खींचतान, परिवारवाद और न जाने कितने मुद्दे उछाले जाने लगे हैं. कुछ लोगों ने तो दिग्विजय का संघ-भाजपा से कनेक्शन भी ढूंढ लिया. इस पर कई चीजें स्पष्ट नहीं हैं. दिग्विजय को एक बात और समझनी चाहिए कि आज से 10 साल पहले जब एमपी और राजस्थान में अपेक्षाकृत कांग्रेस के लिए ज्यादा बड़ा मौका था तब वरिष्ठ नेताओं के चक्कर में ही संगठन मजबूत नहीं हो सका. तब परिवारवाद और अपने अहम के चक्कर में युवाओं को आगे नहीं आने दिया गया. 

बताते हैं कि दिग्विजय सिंह ने जब राघौगढ़ नगर पालिका के अध्यक्ष का पद संभाला था तभी उन्हें जनसंघ में शामिल का न्योता मिला था. खैर, एमपी में सिंधिया और सिंह के बीच कई तरह की बातें कही जाती हैं. वरिष्ठ पत्रकार सुनीता अरोन अपनी किताब The Dynasty- Born to rule के चैप्टर 13 (रियासत और सियासत) में लिखती हैं कि 2014 की हार के बाद फुर्ती दिखाते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी पर ज्यादा नियंत्रण करना शुरू कर दिया. परछाईं से निकलकर कुछ युवा नेता भी सामने आए. ऐसा लगा जैसे यह पार्टी के लिए सुधरने या खत्म होने का समय था. जैसे ही युवाओं ने एक आक्रामक विपक्ष की अपनी नई भूमिका में राहुल का साथ देना शुरू किया, वरिष्ठ नेता घबरा गए। दो युवा नेता जिन्होंने पार्टी की कमान जोरदार तरीके से संभाली- वे थे मध्य प्रदेश से ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान से सचिन पायलट. 

रॉयल सिंधिया, मध्य प्रदेश से अपनी लोकसभा सीटें जीतने वाले दो कांग्रेस नेताओं में से एक थे. दूसरे छिंदवाड़ा से कमलनाथ थे. सिंधिया ने तब ललित मोदी से जुड़े एक सनसनीखेज मुद्दे पर संसद में जोरदार तरीके से बात रखी. कांग्रेस ने संसद के अंदर और बाहर देश में एक सियासी तूफान ला दिया. राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट ने अपने राज्य में इस रेगिस्तानी राज्य में माहौल गरम किया. इसी किताब में आगे वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के एक बयान का जिक्र है. 

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नीरजा चौधरी ने संसद के सेंट्रल हॉल में सोनिया गांधी से अपनी अचानक हुई मुलाकात के बारे में अनौपचारिक रूप से बताते हुए कहा, ‘मैं इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हूं कि कांग्रेस आलाकमान के पास इस समय युवा नेतृत्व को राज्यों की कमान सौंपने की कोई योजना है. वह मध्य प्रदेश की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को दे सकते हैं, जहां पार्टी 15 साल से सत्ता से बाहर है. युवा नेतृत्व को आगे आना चाहिए.’ यह वो दौर था जब भाजपा के सीएम पर गंभीर आरोप लग रहे थे और कई लोग चाहते थे कि कांग्रेस सही समय पर कदम उठाए. 

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हालांकि नीरजा ने सोनिया का गर्व से चमकता चेहरा देखा, जब अगस्त 2015 में संसद में राहुल के जोरदार भाषण की तारीफ की गई. सबसे बड़ा सवाल यह है- क्या मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान संभालने देंगे, खासकर तब जब उनका अपना स्मार्ट, अमेरिका में पढ़ा-लिखा बेटा, जय वर्धन राजनीति में आ चुका है? सिंधिया और सचिन के राज्यों में कांग्रेस की परेशानियां एक जैसी हैं, पार्टी के अंदरूनी झगड़े. कई नेता सब खराब कर रहे हैं. 

किताब में दावा, पिता जनसंघ सांसद थे

आगे वरिष्ठ पत्रकार सुनीता अरोन कहती है कि दिग्विजय सिंह भी राघौगढ़ रियासत के शाही परिवार से आते हैं, जो सिंधिया के ग्वालियर राज्य के अधीन था. उनके पिता बलभद्र सिंह पूर्व जनसंघ सांसद थे. JV (दिग्विजय के बेटे) ने 2011 में राघौगढ़ से राजनीति में कदम रखा. राघौगढ़ का प्रतिनिधित्व उनके परिवार की तीन पीढ़ियों – उनके दादा, पिता और चाचा ने किया था. हममें से कई लोगों को अजीब लग सकता है जो पक्के तौर पर मानते हैं कि वंशवादी राजनीति लोकतांत्रिक परंपराओं की मूल भावना के खिलाफ है, लेकिन कांग्रेस में ऐसा ही होता आया है. fallback

पिता पहले कांग्रेसी फिर स्वतंत्र 

हालांकि दिग्विजय सिंह की आधिकारिक वेबसाइट पर लिखा है कि उनके पिता राजा बलभद्र सिंह II राघौगढ़ के 12वें राजा थे. वह 1947 तक कांग्रेस में थे लेकिन 1967 में अपनी दुखद मृत्यु तक स्वतंत्र रहे. वह 1952 में राघौगढ़ निर्वाचन क्षेत्र से मध्य भारत विधान सभा के सदस्य चुने गए थे.

कांग्रेस नेता ने कहा जड़ में मट्ठा डालने वाला

पूर्व सांसद सत्यव्रत चतुर्वेद की बेटी और कांग्रेस की पदाधिकारी निधि चतुर्वेदी ने एमपी के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह पर जमकर भड़ास निकाली. उन्होंने कांग्रेस लीडरशिप से कार्रवाई की मांग भी कर दी. ‘घर वापसी की छटपटाहट?’ का अंदेशा जताते हुए उन्होंने दिग्विजय को कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने वाला बताया है.

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उन्होंने लिखा, ‘मध्य प्रदेश की राजनीति में ठाकुरवाद, सामंतवाद और गुटबाजी को खाद-पानी देकर दिग्विजय सिंह ने हमेशा कांग्रेस को मजबूत करने के बजाय उसे भीतर से खोखला किया है. मध्य प्रदेश की राजनीति में यदि कोई एक चेहरा पिछले बीस वर्षों से लगातार हस्तक्षेप करता रहा है, तो वह दिग्विजय सिंह हैं. संगठनात्मक फैसले हों, नेतृत्व चयन हो या राजनीतिक दिशा तय करने की बात – हर जगह उनकी भूमिका निर्णायक रही है. इसका परिणाम यह हुआ कि कई समर्पित और जमीनी नेता या तो हाशिए पर चले गए या राजनीति से ही बाहर हो गए. कांग्रेस को जितना नुकसान विपक्ष ने नहीं पहुंचाया, उतना दिग्विजय सिंह की अंदरूनी खींचतान और व्यक्ति-केंद्रित राजनीति ने किया.’

हिंदू महासभा कनेक्शन का दावा

वह आगे दावा करती हैं कि The Saffron Tide सहित मध्य प्रदेश की राजनीति पर लिखी गई कई पुस्तकों और शोधपत्रों में उल्लेख मिलता है कि राघौगढ़ राजघराने की जड़ें हिंदू महासभा से जुड़ी रही हैं. आगे उन्होंने दावा किया है कि दिग्विजय सिंह के पिता बलभद्र सिंह 1951-52 के चुनावों में राघौगढ़ विधानसभा से निर्दलीय जीते थे लेकिन उन्हें अखिल भारतीय हिंदू महासभा और भारतीय जनसंघ (जो आज की भाजपा का पूर्ववर्ती संगठन है) का खुला समर्थन प्राप्त था.  

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