News in Brief

Bhiwandi Mayor: भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र में बड़ा झटका लगा है. भिवंडी में भाजपा के बागी काउंसलर नारायण चौधरी कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के समर्थन से मेयर चुने गए हैं. ये चुनाव शुक्रवार को हुए थे, जिसमें नारायण चौधरी को 90 सदस्यों वाली महानगरपालिका में 48 वोट मिले, जबकि बीजेपी की अधिकृत प्रत्याशी स्नेहा पाटिल को सिर्फ 16 वोट ही मिल सके. बहुमत का आंकड़ा 46 था.

किस पार्टी को मिले कितने वोट

दरअसल यहां पिछले महीने हुए चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत मिला नहीं था. कांग्रेस ने 30 सीटें जीतीं, BJP ने 22, शिवसेना ने 12, एनसीपी (एसपी) ने 12, समाजवादी पार्टी ने 6, कोणार्क विकास अघाड़ी ने 4, भिवंडी विकास अघाड़ी ने 3 और 1 निर्दलीय उम्मीदवार चुना गया था.

भिवंडी नगर निगम चुनाव परिणाम: किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं

रैंकपार्टी का नामजीती गई सीटें
1कांग्रेस30
2भारतीय जनता पार्टी (BJP)22
3शिवसेना12
3NCP (SP)12
5समाजवादी पार्टी6
6कोणार्क विकास अघाड़ी4
7भिवंडी विकास अघाड़ी3
8निर्दलीय1

© ZEE NEWS

9 पार्षदों के साथ अलग हुए नारायण चौधरी

चुनावों में कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं. जिसके बाद मेयर बनाने के लिए छोटी पार्टियों और गठबंधनों का किरदार बड़ा होता हो गया. ऐसे में भाजपा के मेयर पद के उम्मीदवार नारायण चौधरी ने 9 अन्य पार्षदों के साथ अपनी पार्टी से अलग हो गए हो गए और एक नया गुट बनाकर उन्होंने अपना समर्थन कांग्रेस को दे दिया.

Add Zee News as a Preferred Source

नारायण चौधरी ने क्यों की बगावत?

कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने पहले नारायण चौधरी का अपना मेयर पद का उम्मीदवार घोषित किया था. हालांकि बाद में उसने नारायण चौधरी को हटाते हुए उनकी जगह स्नेहा चौधरी को मेयर पद का उम्मीदवार ऐलान कर दिया. अपना पत्ता साफ होते देख नारायण चौधरी गुट ने दावा किया कि इस कदम से काउंसलर्स में नाराजगी पैदा हुई है. 

यह भी पढ़ें:
फ्यूल टैंक, ब्लैक बॉक्स…अजित पवार की पत्नी को किस बात का संदेह? प्लेन क्रैश की सीबीआई जांच होगी!

अपनी ही नेताओं ने की क्रॉस वोटिंग

भारतीय जनता पार्टी के लिए यह बड़ा झटका है, क्योंकि यहां पार्टी को विपक्षी उम्मीदवारों से खतरा पैदा नहीं हुआ, बल्कि अपनों की नाराजगी के चलते यह नतीजा देखा पड़ा है. जब अपने ही पार्षद क्रॉस-वोटिंग करें, तो यह इशारा जाता है कि स्थानीय नेतृत्व और टिकट बांटने को लेकर पार्टी में गहरी नाराजगी है. 

भाजपा को उसी तरीके से मिली हार

हालांकि इस तरह की रणनीति बनाने के लिए भाजपा काफी मशहूर है. उसने कई जगहों पर विपक्षी नेताओं को अपने साथ मिलाकर सत्ता हासिल की है. यहां पर कांग्रेस के पास अकेले पर्याप्त संख्या नहीं थी, फिर भी उसने भाजपा के बागियों को साथ लेकर मेयर पद जीत लिया. 

2022 में उद्धव सरकार गिरी

2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा- शिवसेना ने एक साथ चुनाव लड़ा था. हालांकि बाद में शिवसेना ने कांग्रेस और शरद पवार की NCP के साथ मिलकर सरकार बना ली थी. हालांकि जून 2022 में शिवसेना के एकनाथ शिंदे ने बगावत पार्टी के साथ बगावत की और 40 से ज्यादा विधायकों को अपने पाले में ले लिया. इसके बाद उद्धव सरकार गिर गई और फिर एकनाथ शिंदे और उनके साथी विधायकों ने भाजपा को समर्थन दिया. जिसके बाद भाजपा ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री का पद भी दिया था. 

यह भी पढ़ें:
अजित पवार का प्लेन नोज-डाउन क्रैश हुआ? इंजन तो दो थे… अंदर कौन-कौन था, अब तक क्या पता चला

2020 में कमलनाथ की सरकार गिरी

महाराष्ट्र के अलावा मध्य प्रदेश का उदाहरण भी काफी चर्चा में रहता है. 2018 में राज्य के अंदर कांग्रेस की सरकार की थी और कमलनाथ मुख्यमंत्री पद पर थे. हालांकि मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 22 विधायकों के साथ इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन कर ली थी. सरकार गिर गई और बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बने.