
US Iran peace talk news: चंद दिन पहले तक हाथ में पिस्तौल लिए घूम रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप अब शांति चाहते हैं. लगता है ट्रंप ने अपनी पिस्तौल अब जेब में रख ली है. हां ये जरूर है कि ट्रंप अब भी दुश्मनों को अपनी पिस्तौल की मारक क्षमता दिखाने से चूक नहीं रहे हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की मेज सजाई जा रही है. तुर्किए में बातचीत का प्रस्ताव है. शांति से जीने के लिए आमेरिका के फाइटर जेट्स ने ईरान के ड्रोन को मार गिराया. ईरान का ये ड्रोन अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन के पास आ रहा था. यानी ये ड्रोन अमेरिका के सबसे शक्तिशाली एयरक्राफ्ट कैरियर की जानकारी जुटा रहा था.
यूएस के चक्रव्यूह को कैसे भेद रहा ईरान
ईरान ने अमेरिका की इस कार्रवाई को आक्रमक करार दिया है. वहीं अमेरिका कह रहा है कि ये सेल्फ डिफेंस था. चंद दिन पहले ही ईरान ने यूएसएस अब्राहम लिंकन का एक ड्रोन वीडियो जारी किया था. ये अमेरिका की समुद्री ताकत के लिए बड़ी चुनौती है. क्योंकि ईरान के आसपास समंदर में इस वक्त USS Abraham Lincoln के साथ ही यूएसएस मैकफॉल, यूएसएस मिट्चर, यूएसएस कैनबरा, यूएसएस तुलसा, यूएसएस सांता बारबरा और यूएसएस डेलबर्ट डी. ब्लैक जैसे युद्धपोत तैनात हैं.
अगर ईरान पर अटैक की नौबत आई तो अपने विध्वंसक वॉरशिप्स के जरिए अमेरिका सिर्फ तीन दिन में ईरान के कमांड और कंट्रोल, एयर डिफेंस और प्रमुख सैन्य ठिकानों को तबाह कर सकता है. ये तैनाती ईरान के खिलाफ अमेरिका का चक्रव्यूह है. सोचिए ईरान अपने ड्रोन से अमेरिका के इस चक्रव्यूह को भी भेद रहा है.
यूएसएस अब्राहम लिंकन तक ईरान के ड्रोन का पहुंचना अमेरिका के लिए इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि कहा जा रहा था कि ईरान के नजदीक पहुंचने के बाद एयरक्रॉफ्ट करियर घोस्ट मोड में चला गया. वॉरशिप करियर के ऑटोमैटिक आईडेंटिफिकेशन सिस्टम ट्रांसपॉन्डर्स को ऑफ कर दिया गया था. रडार और रेडियो एमिशन को बंद कर दिया गया था. इससे यूएसएस अब्राहम लिंकन करीब-करीब अदृश्य हो गया.
अपने इस जहाज के जरिए मदद कर रहा चीन
अब सोचिए अदृश्य हो चुके एयरक्राफ्ट करियर के पास ईरान ने ड्रोन भेज दिया. सवाल ये है कि अदृश्य हो चुके एयक्राफ्ट करियर की सटीक लोकेशन, पिन प्वाइंटेड जानकारी ईरान को कहां से मिली. क्या ईरान के सैटेलाइट्स, रडार इतने ताकतवर हैं कि उन्होंने घोस्ट मोड में जा चुके यूएसएस अब्राहम लिंकन की लोकेशन पता कर ली. या इसके पीछे कोई और है. इसका जवाब है चीन.
ईरान के करीब समंदर में जहां यूएसएस अब्राहम लिंकन मौजूद है वहीं आसपास चीन का समुद्री जहाज दयांग यिहाओ भी तैनात है. चीन दयांग यिहाओ को रिसर्च से जुड़ा शिप बताता है. लेकिन असल में ये समंदर में चीन की आंख है. चीन का ये जासूसी जहाज एडवांस्ड सीबेड मैपिंग से लैस है. इससे ये समंदर के अंदर सैकड़ों किलोमीटर तक रियल-टाइम जानकारी जुटाता है.
समंदर के अंदर की जानकारी जुटाने के लिए इसमें रिमोटली ऑपरेटेड अंडरवाटर व्हीकल्स मौजूद हैं. यानी शिप में बैठा क्रू दूर से ही दूसरे शिप की गतिविधियों की जानकारी जुटा सकता है. इसका सोनार सिस्टम सबमरीन को पहचानने, पानी के नीचे कम्युनिकेशन को इंटरसेप्ट करने और मिसाइल टेस्ट को ट्रैक करने में सक्षम है.
ईरान ने बातचीत में अटकाया पेच
चीन का इतिहास ऐसा ही रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को भी चीन ने ही भारत से जुड़ी खुफिया जानकारी मुहैया कराई थी. जिनपिंग ईरान को हथियार की सप्लाई कर चुके हैं. इसलिए चीन पर शक है. हालांकि अमेरिका ने ईरान के ड्रोन को मारकर खतरा टाल दिया.
प्रसिद्ध विद्वान अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि शांति को बल से बनाए नहीं रखा जा सकता. इसे केवल समझदारी से हासिल किया जा सकता है.
ईरान से तनातनी के बीच अब ट्रंप शांति वाली समझदारी की बात भी कर रहे हैं. अब तक के प्लान के मुताबिक 6 फरवरी को बातचीत हो सकती है. लेकिन अब ईरान ने बातचीत में एक पेच अटका दिया हैतयशुदा प्लान के मुताबिक ईरान अमेरिका की वार्ता तुर्किए में होनी थी. अमेरिका की तरफ से बातचीत में ट्रंप के विशेष दूत स्टिव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर के शामिल होने की संभावना थी. वहीं ईरान के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्री अब्बास अरागची करनेवाले थे.
तुर्की नहीं, ओमान में बातचीत पर जोर
लेकिन बातचीत शुरू होने से पहले ईरान ने नई शर्त रख दी है. ईरान चाहता है कि बातचीत तुर्किए में ना होकर ओमान में होनी चाहिए क्योंकि तुर्किए अमेरिका का सहयोगी है. वहीं ओमान को ईरान न्यूट्रल देश मानता है. ईरान चाहता है कि मीटिंग में सिर्फ अमेरिका की मौजूदगी रहे. वहीं अमेरिका की तरफ से मीटिंग में सऊदी अरब, कतर, मिस्र को शामिल करने की भी चर्चा है.
ईरान सिर्फ परमाणु हथियारों के मुद्दे पर बात करना चाहता है. वहीं अमेरिका की तरफ से एजेंडे में मिसाइल प्रोग्राम और हिजबुल्लाह, हमास जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को ईरान से मिलनेवाली मदद को भी शामिल करने पर जोर है.
आखिरी वक्त में ईरानी शर्त से असमंजस
2025 में ओमान में अमेरिका और ईरान के बीच एक राउंड की बातचीत हुई थी. इसलिए भी ईरान तुर्किए की बजाए ओमान में बातचीत करना चाहता है. आखिरी वक्त में ईरान की इस शर्त ने बातचीत को लेकर संशय वाला माहौल बना दिया है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा है कि “शांति का कोई रास्ता नहीं है, शांति ही रास्ता है.” अच्छी बात ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी शायद ये समझ आ रहा है. या हो ये भी सकता है कि जब ताकत से बात बनती नज़र नहीं आ रही है तो ट्रंप कूटनीति के रास्ते अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहे हैं.
