News in Brief

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आज पूरा देश याद कर रहा है. 25 दिसंबर को जन्मे वाजपेयी पाकिस्तान से भी अच्छे रिश्ते चाहते थे. लाहौर में उनकी लोकप्रियता देख पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भी कहना पड़ा था कि वाजपेयी जी, आप तो पाकिस्तान में भी चुनाव जीत सकते हैं. अशोक टंडन अपनी किताब ‘अटल संस्मरण’ में लिखते हैं – मुझे दो बार भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयीजी के साथ पाकिस्तान जाने का मौका मिला था. पहली बार लाहौर बस यात्रा के दौरान और दूसरी बार इस्लामाबाद सार्क सम्मेलन के समय. उन्होंने वाजपेयी के लाहौर वाले अकबर के किले में जाने का किस्सा भी लिखा है. 

लाहौर बस यात्रा में अटलजी के साथ कई प्रमुख हस्तियां मौजूद थीं. इनमें- फिल्म अभिनेता देव आनंद, शत्रुघ्न सिन्हा, गायक महेंद्र कपूर, प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, क्रिकेटर कपिल देव शामिल थे. इस ऐतिहासिक मौके को कवर करने के लिए भारतीय मीडिया का एक बहुत बड़ा दल लाहौर पहुंचा था. अमृतसर हवाई अड्डे से वाघा बॉर्डर पार कर जब अटलजी की बस लाहौर की गलियों से गुजरती हुई गवर्नर हाउस की ओर जा रही थी तो घरों की खिड़कियों से झांकते हुए बड़ी संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चे हाथ हिलाकर उनका अभिवादन कर रहे थे. 

पाकिस्तान की जनता के लिए अटल का सीधा संदेश

Add Zee News as a Preferred Source

यह दृश्य अत्यंत अद्भुत और भावुक करने वाला था. पूरी दुनिया की नजरें इस ऐतिहासिक पहल पर टिकी थीं. भारत और पाकिस्तान की आम जनता को यह विश्वास होने लगा था कि अब दक्षिण एशिया में शांति स्थापित हो सकेगी और सभी पड़ोसी राष्ट्र आपसी सम्मान एवं सौहार्द के साथ विकास के पथ पर अग्रसर होंगे. गवर्नर हाउस के लॉन से जब अटल बिहारी वाजपेयी ने सीधे प्रसारण द्वारा पाकिस्तान की जनता से संवाद स्थापित किया तो यह लग रहा था मानो भारत से शांति और भाईचारे का एक फरिश्ता खुद चलकर वहां आया हो. 

Zee Archive: क्या अटलजी का कोई अफेयर था? इस सवाल पर क्यों शरमा गए पूर्व पीएम

उन्होंने कहा, ‘बहुत लड़ लिए. आखिर हम कब तक आपस में लड़ते रहेंगे. आइए, मिलकर लड़ें गरीबी से, बीमारी से. आपस में सहयोग करें ताकि दोनों पड़ोसी मिलकर विकास की राह पर चलें. हम दोस्त बदल सकते हैं मगर पड़ोसी नहीं.’
यह भावनात्मक अपील अटलजी के हृदय से निकलकर पाकिस्तान की अवाम तक सीधे पहुंची. प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इस अपील से प्रभावित होकर उनसे कहा, ‘वाजपेयी जी, अब तो आप पाकिस्तान से भी इलेक्शन जीत सकते हैं.’

यात्रा के दौरान कुछ भारत विरोधी तत्वों ने विरोध प्रदर्शन भी किए, लेकिन पाकिस्तान की आम जनता ने इस पहल का व्यापक स्वागत किया. अटल जी मीनार-ए-पाकिस्तान भी गए और वहां अपने हाथ से लिखा- ‘भारत पाकिस्तान के अस्तित्व को पूरी तरह स्वीकार करता है और उसके विकास एवं प्रगति की कामना करता है.’ इस यात्रा के बाद कुछ विरोधी तत्वों ने मीनार-ए-पाकिस्तान को पानी से धोने जैसा प्रतीकात्मक विरोध किया, लेकिन अटलजी के इस सद्भावना संदेश का पाकिस्तान की जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा. 

Zee Archive: 1979 की वह घटना, जिससे टूट गए थे अटल बिहारी बाजपेयी; लिखी कविता- गीत नहीं गाता हूं

लाहौर में अटलजी ने महाराजा रणजीत सिंह के स्मारक गुरु अर्जुन देव के शहीदीस्थल एक गुरुद्वारा और अकबर द्वारा बनाए गए शाही किले का भी दौरा किया. नवाज शरीफ ने उनका नागरिक अभिनंदन इसी किले में किया. 

हालांकि इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ वाघा बॉर्डर पर अटलजी के स्वागत के लिए नहीं पहुंचे. शायद उस समय वह अपनी सेना द्वारा रचित कारगिल षड्यंत्र को अंतिम रूप देने में लगे थे, जिसे उन्होंने वाजपेयीजी की शांति यात्रा के कुछ ही समय बाद अंजाम दिया. अटलजी की राजनीतिक ईमानदारी ही थी कि जब पाकिस्तान ने भारत की पीठ में छुरा घोंपा, तब भी देश की जनता ने इसे उनकी कूटनीतिक पराजय नहीं माना. 

पढ़ें: जब पीएम आवास से शपथ के लिए एक नाम के दो सांसदों को गया फोन

इसके उलट, विश्व समुदाय ने पाकिस्तान के इस रवैए की आलोचना की और अटलजी के शांति प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उनकी छवि एक ‘शांति के पुरोधा’ के रूप में उभरी. यही कारण था कि जब पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ की, तो चीन सहित वैश्विक समुदाय ने पाकिस्तान की निंदा की. जो लोग अटलजी की लाहौर यात्रा को उनकी कमजोरी समझ रहे थे, उन्हें भारतीय सेना और वायु सेना के जांबाजों ने करारा जवाब दिया. कारगिल की चोटियों पर कब्जा जमाए बैठे घुसपैठियों को खदेड़कर भारत ने अपने शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया इसलिए हर वर्ष ‘कारगिल विजय दिवस’ को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. 

आखिर में अटलजी की बढ़ती लोकप्रियता और पाकिस्तान में उनकी स्वीकार्यता से हताश होकर जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की सरकार का तख्ता पलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया. लाहौर यात्रा के दौरान भारतीय पत्रकारों को वहां के लोगों से मिलने और बातचीत करने का मौका मिला था. हमें एक काफी टेबल बुक भेंट की गई थी और उसके पहले पन्ने पर लिखा था historic city of Lahore: named after the Legendary King Rama’s son Love. पूछने पर कि क्या यह स्थानीय लोगों को भी मिलती है? हमें बताया गया कि यह काफी टेबल बुक केवल विदेशी टूरिस्ट्स के लिए है. हमारे देश के पत्रकार दल की कुछ महिलाओं ने पाकिस्तानी महिला पत्रकारों से बातचीत की थी और एक रोचक प्रसंग सुनने को मिला था. बातचीत के दौरान एक महिला पत्रकार की छोटी बेटी अपनी मां के कान में कुछ बोल रही थी. भारतीय महिलाओं के पूछने पर पता चला कि वह बच्ची कह रही थी कि ‘यह लोग इतने बुरे तो नहीं हैं, जितने हमें बताया जाता है.’ 

पढ़ें: वाजपेयी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही एक कांग्रेसी ने चिट थमा दिया, अब पता चला लिखा क्या था

टंडन लिखते हैं कि इस्लामाबाद सार्क सम्मेलन के दौरान हम लोगों के लिए तक्षशिला भ्रमण की व्यवस्था की गई थी और वहां के पुरातत्त्व विभाग के अधिकारियों ने कुछ दूरी पर स्थित ऊंचे टीले की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘वहां अभी भी आपका बहुत सारा पुराना इतिहास दबा हुआ है, यूनेस्को से कहकर खुदाई करवा लीजिए.’ उत्सुकतावश मैंने पूछा कि यहां का नाम तक्षशिला कैसे पड़ा था? उस अधिकारी ने हैरान होकर कहा कि क्या आपको पता नहीं कि तक्ष भरत के बेटे का नाम था और यह शहर उसी के नाम पर बना है.