
अतिवादियों की नई पौध तैयार करने वाले संक्रमित सोच के मौलानाओं को आईना दिखाने के लिए राष्ट्रवादी मुसलमान सड़क पर उतरे. सेलेक्टिव सोच वाले इच्छाधारी मानवतावादियों की आंखों से पट्टी उतारने के लिए लखनऊ से लेकर मुंबई तक मानवता के साथ अपनी आवाज बुलंद की. जिन्होंने बताया कि हिंदुस्तान में धर्मनिरपेक्षता का असली मतलब क्या होता है. इसलिए हम “फिलिस्तीन प्रेमी गैंग” के हिमायती कट्टरपंथी मौलानाओं की आंखें खोलने वाले वाले प्रदर्शन का विश्लेषण करेंगे.
हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ प्रदर्शन
मुंबई में बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हुए अत्याचार के खिलाफ मौलनाओं का प्रदर्शन हुआ. इस विरोध प्रदर्शन में मुंबई और आसपास के जिलों की कई मस्जिदों के इमाम और जिम्मेदार लोगों ने शिरकत की. उनके हाथों में तख्तियां थीं, जिनमें हिंदुओं पर अत्याचार का विरोध था. ये लोग ना सिर्फ बांग्लादेश के हत्यारे कट्टरपंथियों का विरोध कर रहे थे, बल्कि ये उन गाजा प्रेमी गैंग को भी संदेश दे रहे थे, जिनकी सहानुभूति धर्म देखकर जगती है. राष्ट्रवादी मौलानाओं ने देश के मिलावटी विचारों वाले मौलानाओं को संदेश दिया.
जिस तरह मुंबई में मौलाना बांग्लादेशी अत्याचारियों के खिलाफ सड़क पर उतरे थे, उसी तरह लखनऊ में भी धर्मनिरपेक्ष मुसलमान प्रदर्शन कर रहे थे. जिन कट्टरपंथियों ने बांग्लादेश में हिंसा की. दीपूदास की हत्या की और जिन लोगों ने मौन धारण कर ऐसे कट्टरपंथियों का वैचारिक समर्थन किया, उन सबको जमकर लताड़ लगाई.
शूल की तरह चुभेंगे राष्ट्रवादी मुस्लिमों के शब्द
लखनऊ के राष्ट्रवादी मुसलमानों के शब्द कट्टपंथियों को शूल की तरह चुभेंगे. उन धर्मांधों को बेहिसाब दर्द देंगे, जो बांग्लादेशी में मॉब लिंचिंग के क्रूरतम रूप को देखकर भी सिर्फ इसलिए चुप हैं क्योंकि दीपू एक बांग्लादेशी हिंदू था और मारने वाला मुसलमान. ये उन साजिद रशीदी जैसे कैमरा प्रेमी मौलानाओं को भी बेचैन कर देगा, जो कैमरे पर आकर कट्टरपंथी हत्यारों की टोली की.. ये कहते हुए समर्थन करते हैं कि ईशनिंदा करने की वजह से दीपू मारा गया. जिनका खून सिर्फ गाजा के नाम पर खौलता है, उन्हें लखनऊ के मौलानाओं की बात जरूरत जाननी चाहिए.
लखनऊ और मुंबई के देशभक्त मुसलमानों ने जो कहा है वो हर हिंदुस्तानी के मन में होना चाहिए. ये हर किसी की आवाज़ होनी चाहिए. क्योंकि बांग्लादेश हमसे ही अलग हुआ एक देश है, हमारा पड़ोसी देश है. वहां के हिंदुओं की जड़ें हिंदुस्तान में ही हैं. लेकिन जिनकी सोच में मजहबी कट्टरवाद हैं और जो धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर सो रहे हैं, उन दोनों को इससे फर्क नहीं पड़ता. उनको किस बात से फर्क पड़ता है वो हम आपको बताते हैं. उनको फिलिस्तीन से फर्क पड़ता है.
जैसे ही फिलिस्तीन और गाजा शब्द का प्रयोग होता है, वैसे ही एक अलग तरह की खलबली मच जाती है. ऐसा लगता है जैसे मछली को तालाब से बाहर निकाल के रख दिया. अगर ऐसा नहीं होता तो एक स्टैंडअप कॉमेडियन का सिर्फ इसलिए विरोध नहीं होता, क्योंकि उसकी कॉमेडी में फिलिस्तीन का प्रयोग हुआ था.
शोरेन वर्मा की कॉमेडी से खौला खून
शोरेन वर्मा की कॉमेडी पर हिंदुस्तान के कुछ मुसलमानों का खून खौलने लगा. बांग्लादेश में दीपूदास की हत्या पर जिन-जिन की सहानुभूति छुट्टी पर चली गई थी, वो लौट गई. सोशल मीडिया पर रूदाली शुरू हो गई. फिलिस्तीन वाली मानवीय संवेदना की नदी में शोरेन वर्मा को डुबाने का सामूहिक कृत्य होने लगा. सोचिए, एक कॉमेडी पर इतना विलाप करने वालों में से किसी ने भी एक शब्द बांग्लादेश में दीपूदास की बर्बर हत्या पर नहीं कहा. क्यों नहीं कहा ? क्योंकि ये अतिवाद के वायरस से ग्रसित लोग हैं. हालांकि ऐसे कट्टरवादियों के कुछ ऐसे एजेंडाधारी सहोदर भी हैं, जो विदेश में बैठे हुए हैं और दीपूदास की हत्या पर जो संवेदना जता रहे हैं, उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं.
बॉलीवुड एक्ट्रेस जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेश में हुई बर्बरता का विरोध किया तो एक एजेंडाधारी यूट्यूबर को अखर गया. ऐसा लगा जैसे जाह्नवी ने चोट तो बांग्लादेशी कट्टरपंथी पर की, लेकिन दर्द उन अतिवादियों के वैचारिक सहोदर को हुई.
उस एजेंडाधारी यूट्यूबर ने जाह्नवी कपूर के लिए शब्दों की मर्यादा का पिंडदान कर दिया. जब फजीहत हुई तो सफाई का पुलिंदा पेश करने लगा. ऐसे एजेंडाधारी यूट्यूबर भी अंडर कवर कट्टपरंथी की श्रेणी में ही आते हैं. ये सोशल मीडिया पर लाइक, कॉमेंट और शेयर के लिए कट्टरपंथियों को अपना ईष्टदेव मानकर उनका गुणगान करते हैं. गाजा और फिलिस्तीन का गाना गाकर अपने ईष्टदेव की आरती उतारते फिरते हैं. लेकिन हिंदुओं पर हत्या के बाद ना सिर्फ चुप्पी साध जाते हैं, बल्कि जो बोलता है, उसपर अशोभनीय टिप्पणी भी करते हैं, ताकि उनके आराध्य प्रसन्न रहें. ऐसे ही एजेंडाधारी यूटयूबर और उनके वैचारिक सहोदर कट्टरपंथियों को लखनऊ और मुंबई के मौलानाओं ने सड़क पर उतरकर जवाब दिया है.
