
DG Brahmos Appointment : केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) ने 25 नवंबर 2024 को जारी DRDO के DG (BrahMos) जैतीर्थ आर जोशी की नियुक्ति आदेश को मनमाना और कानून के अनुरूप नहीं बताते हुए इस रद्द कर दिया. ट्रिब्यूनल ने कहा कि तीनों उम्मीदवारों को समान रूप से योग्य मानते हुए 80 अंक दिए गए, लेकिन सबसे जूनियर अधिकारी को चुनने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया. सलेक्शन पैनल की ओर से नामों को अल्फाबैटिकल ऑर्डर में रखने पर आपत्ति जताते हुए CAT ने कहा कि ऐसा करने की कोई नियमावली नहीं है.
CAT का बड़ा फैसला
अदालत ने पाया कि नोट फाइल में अंकों के निर्धारण और अंतिम चयन पर कोई ठोस कारण दर्ज नहीं है. CAT ने स्पष्ट किया कि जब उम्मीदवार समान हों तो वरिष्ठता, वेतन स्तर, अनुभव और पूर्व पदोन्नतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ट्रिब्यूनल ने रेखांकित किया कि Distinguished Scientist (DS) का दर्जा स्वचालित नहीं, बल्कि कठोर पीयर-रिव्यू प्रक्रिया से मिलता है, इसलिए इसका महत्व है.
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नियुक्ति को बताया कानून का उल्लंघन
CAT ने कहा कि DG जैसे पद सामान्यतौर पर DS को दिए जाते हैं. साइंटिस्ट ‘H’ को तभी मौका मिलता है जब DS उपलब्ध न हों. अदालत ने फैसला दिया कि केवल न्यूनतम पात्रता पूरी करना, अधिक योग्यता और अनुभव पर भारी नहीं पड़ सकता. नियुक्ति को उचित विचार-विमर्श से रहित बताते हुए इसे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन माना गया. DRDO को 4 हफ्ते के अंदर मामले पर पुनर्विचार का निर्देश, साथ ही चयनित अधिकारी को अंतरिम प्रभार देने पर रोक लगाई है.
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DRDO और DRDO प्रमुख पर कोर्ट की सख्त टिप्पणियां
CAT ने कहा कि DRDO चेयरमैन का विवेकाधिकार असीमित नहीं है और कारणयुक्त फैसला जरूरी है. ट्रिब्यूनल ने पाया कि जूनियर साइंटिस्ट ‘H’ को DS पर तरजीह देने का कोई औचित्य नहीं बताया गया. कोर्ट ने कहा कि DRDO SOP के तहत विवेकाधिकार इस्तेमाल करने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति दर्ज नहीं की गई. स्वीकृति आदेश को निर्जीव बताते हुए CAT ने कहा कि इसमें सोच-विचार का अभाव है. वरिष्ठता और DS दर्जे को महत्वहीन बताने का DRDO का तर्क अदालत ने अतार्किक और आत्म-विरोधी करार दिया. ट्रिब्यूनल ने संस्थागत विरोधाभास की ओर इशारा किया. नेतृत्व भूमिकाओं में DS को अहम माना जाता है, लेकिन इसी चयन में नजरअंदाज किया गया. CAT ने कहा कि चयन प्रक्रिया पहले से तय प्रतीत होती है, जो खोखली औपचारिकता बनकर रह गई. अदालत ने चेतावनी दी कि बिना नियंत्रण का विवेकाधिकार मनमानी को जन्म देता है, जो संवैधानिक शासन के खिलाफ है.

