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नई दिल्ली: भारतीय सेना (Indian Army) को शुक्रवार को एक खास तरह का पुल मिल गया जिसका इंतजार सेना को काफी दिनों से था. 10 मीटर के ब्रिजिंग सिस्टम को सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे (Gen. MM Narvane) ने सेना में शामिल किया. ये ब्रिजिंग सिस्टम खासतौर पर पाकिस्तान की सीमा पर बहुत काम आएगा जहां कम चौड़ी नदियों, नालों और नहरों को पार करना होता है. इस सिस्टम की खासियत ये भी है कि इसमें 5 पुल जोड़े जा सकते हैं यानि 50 मीटर तक की नदी को पार किया जा सकता है. 

6 मिनट में पूरा होगा काम

इस पुल को लगाने में 10 मिनट का समय लगता है लेकिन भारतीय सेना के सैनिक इसे 6-7 मिनट में लगा लेते हैं. इस ब्रिजिंग सिस्टम की डिजाइन डीआरडीओ (DRDO) ने तैयार की है और इसे देश में ही लार्सन एंड टूब्रो (L&T) ने बनाया है. भारतीय सेना ऐसे 100 सिस्टम खरीद रही है. आर्मी चीफ जनरल नरवणे ने कहा कि ये सिस्टम आत्मनिर्भर भारत का एक और उदाहरण है और इससे सेना के ऑपरेशनों की रफ्तार बहुत तेज हो जाएगी. 

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आठ पहियों से जाएगी दुश्मनों की मौत

इस पुल का वजन 5.5 टन है जो कुल 70 टन का वजन उठा सकता है. भारतीय सेना की बख्तरबंद गाड़ी का वजन 14 टन और सबसे भारी टैंक का वजन भी 60 टन के करीब होता है. यानि इस पुल से सेना की जरूरत का हर हथियार या उपकरण निकल सकता है. इस सिस्टम को 8 पहियों पर लगाया गया है जिससे ये राजस्थान की रेत में भी तेजी से चल सकता है. इसकी रफ्तार सड़क पर 45 किलोमीटर प्रति घंटा और मैदान में 30 किलोमीटर प्रति घंटा है.

Short Span Bridging Systems

सेना 20 साल से कर रही है इस्तेमाल

पंजाब, राजस्थान और जम्मू के इलाक़ों में ऑपरेशन के लिए सेना को ऐसे ब्रिजिंग सिस्टम्स की जरूरत होती है. सेना ने साल 2000 में 75 मीटर तक पुल बनाने में सक्षम ब्रिजिंग सिस्टम का इस्तेमाल शुरू किया था तब 15-15 मीटर के पांच ब्रिज होते थे. अभी सेना के पास ऐसे 50 सिस्टम हैं. साल 2003 में कम लंबे कार्तिक ब्रिजिंग लेइंग टैंक का प्रयोग शुरू किया गया जिसमें 60 टन वजन उठा सकने वाले 20 मीटर के पुल होते हैं. इस सिस्टम को टी-55( विजयंत) टैंकों पर लगाया गया है. सेना ने ऐसे 34 सिस्टम शामिल किए हैं.

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‘पाकिस्तानी साजिश का पुख्ता इलाज’

दरअसल पाकिस्तान की सीमा पर खेत और घनी आबादी की वजह से कई जगहों पर स्थाई पुलों का निर्माण संभव नहीं है. वहीं पाकिस्तान के अंदर नहरों का बड़ा नेटवर्क है. इन नहरों को युद्ध के लिहाज से एक मोर्चे में भी बदले जाने के लिए तैयार किया गया है. 1965 और 1971 के युद्ध में भारतीय सेना को कई बहुत घमासान लड़ाइयां नहरों और छोटी नदियों को पार करने के लिए लड़नी पड़ी थीं.

जरूरत से ज्यादा लंबे पुलों को संकरी नहरों में इस्तेमाल नहीं किया सकता और उसे इस्तेमाल करने के लिए काफी वक्त लगता है जो तेजी से हमला करती किसी सेना की रफ्तार को खतरनाक रूप से कम कर देता है. 10 मीटर का ब्रिजिंग सिस्टम इस बड़ी कमी को दूर कर देगा. 

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